28 फरवरी : गांधी जी को नहीं मालूम था कि ये राजेंद्र प्रसाद का घर है….

जामताड़ा (सर्च खबर) : बड़े दुख की बात है कि भारत के तमाम बड़े नेताओं का जन्मदिवस किसी न किसी रूप में देशभर में मनाया जाता है लेकिन भारत के पहले राष्ट्रपति और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिवस को भुलाया जा चुका है। इसकी वजह क्या है? क्या इसलिए नेहरू उन्हें पसंद नहीं करते थे? गांधी-नेहरू परिवार के करीबी होने की बजाए उनका अपना एक कद्दावर व्यक्तित्व था और खुद की एक स्वतंत्र विचारधारा। क्या इसलिए कि वो कभी रबर स्टांप राष्ट्रपति नहीं रहे? क्या इसलिए कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनका टकराव अक्सर नेहरू जी से होता रहा? जवाब जो भी हो लेकिन ये हैरानी वाली बात है कि आजादी के बाद इतने सालों में उनका जन्मदिवस मनाने की सुध क्यों कांग्रेस ने नहीं ली?
आज जवाहर लाल नेहरू के वारिसों के नाम तो देश का बच्चा बच्चा जानता है लेकिन उसको न तो गांधी के वारिसों के बारे में कुछ मालूम है और न ही  पटेल या डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के बच्चों के बारे में। चूंकि डॉ. प्रसाद के परिवार से कोई राजनीति में नहीं आया, इसलिए वे उपेक्षित रहे। डॉ. प्रसाद तीन बेटे थे। बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद ने पटना स्थित जीवन बीमा निगम से संभागीय प्रबंधक के रूप में अवकाश प्राप्त किया। हां, 1977 में आपातकाल के बाद घोषित चुनाव में अवश्य वे जनता पार्टी की टिकट पर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1980 के चुनाव में वे खड़े नहीं हुए। दूसरे एवं तीसरे बेटे धनंजय प्रसाद व जनार्दन प्रसाद छपरा में लगभग उपेक्षित जिंदगी जीते रहे। थोड़ी-बहुत खेती बाड़ी और एक स्थानीय बस परमिट से आजीविका चलाते थे वे। राजेंद्र प्रसाद के परिवार तथा किसी भी रिश्तेदार ने उनके पद का लाभ नहीं उठाया। वह खुद नहीं चाहते थे कि उनका कोई नजदीकी रिश्तेदार भी राष्ट्रपति पद की गरिमा पर कोई आंच आने दे।
उनके आखिरी दिन जिस तरह से बीते वो भी दुखद है। वह पटना के सदाकत आश्रम में रहते थे। वहां उनके ढंग से इलाज की व्यवस्था भी नहीं थी। एक राष्ट्रपति की ये आखिरी दिनों में ये हालत हो सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने अपना सबकुछ तकरीबन देश को दिया। अगर वह चाहते तो एक वकील के रूप में खासा कमा सकते थे। वह वर्ष 1910 के आसपास पटना के जाने माने वकील बन चुके थे। वह अपनी सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और वकालत के अपने अकूत ज्ञान के लिए विख्यात थे।

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भारत के राष्ट्रपति बनें

ऐसा लगता है कि पग-पग पर उनका और नेहरू का टकराव उन्हें बाद में भारी पड़ा। एक नहीं दर्जनों उदाहरण हैं कि उनकी राय तत्कालीन प्रधानमंत्री से अलग हुआ करती थी। आमतौर पर नेहरू और वह अलग अलग पाले में नजर आते थे। माना जाता है कि नेहरू चाहते नहीं थे कि वह राष्ट्रपति बने। पटेल हर हाल में चाहते थे कि वह राष्ट्रपति बनें। कांग्रेस के तमाम और दिग्गज नेता भी उनके पक्ष में थे। कुछ समय पहले एक किताब भी आई थी, जिसमें ये खुलासा किया गया कि किस तरह उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए नेहरू ने कथित झूठ का सहारा (हालांकि ये कितना सही है, इसका दावा नहीं किया जा सकता) लिया।

डॉ. प्रसाद ने पंडित नेहरू की बात नहीं मानी और 11 मई 1951 को होने वाले कार्यक्रम में उन्होंने हिस्सा लिया

जब अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल तैयार किया तो राजेंद्र प्रसाद इसके खिलाफ थे और नेहरू पक्ष में। कहा ये भी जाता है कि देश-विदेश अर्थात् घर और बाहर दोनों जगह लोगों से दूर रखने की कोशिश की जाती थी। राजेंद्र बाबू को विदेश यात्रा की अनुमति नेहरू मंत्रिमंडल बिरले ही दिया करता था। छोटे-छोटे देशों की यात्रा पर ही राजेंद्र प्रसाद जा सके थे। हालांकि 12 साल तक राष्ट्रपति रहने के दौरान राजेंद्र पक्ष भरपूर तरीके से राष्ट्रपति भवन में तकरीबन हर मिलनेे के इच्छुक व्यक्ति और संगठनों से मिलते रहे।
डॉ. अंबेडकर की दिल्ली में मृत्यु के पश्चात उनका अंतिम संस्कार सात दिसंबर 1956 को मुंबई की चौपाटी पर किया गया। प्रसाद और नेहरू दोनों उपस्थित थे। संस्कार स्थल पर शोकसभा का आयोजन किया गया। बोलने वालों में राष्ट्रपति का भी नाम था। उन्होंने राजेंद्र बाबू को यह कहकर बोलने से रोकने की कोशिश की कि ‘राष्ट्रपति के लिए उचित नहीं होगा’। राजेंद्र बाबू ने यह कह कर कि ”यह महान आत्मा इसकी अधिकारी है”, नेहरू को निरूत्तर कर दिया। जब सोमनाथ मंदिर का उदघाटन था, तब भी ऐसे ही मतअंतर की बात आई। तब पंडित नेहरू का मानना था कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के मुखिया को किसी धार्मिक स्थान के ऐसे समारोहों में शामिल नहीं होना चाहिए। तब राजेंद्र प्रसाद जी का कहना था कि राष्ट्रपति को सभी धर्मों के समारोहों में समान रूप से शामिल होना चाहिए। इसी तरह एक बार राजेंद्र बाबू काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन के लिए गए। पारिवारिक परंपरानुसार उन्होंने मंदिर में प्रधान पुरोहित के गंगाजल से चरण धोए। नेहरू ने तब पत्र लिखकर आपत्ति जताई। वही पुराना आलाप कि राष्ट्रपति को ऐसा शोभा नहीं देता। राजेंद्र बाबू ने जवाब भेजा दिया कि निजी धार्मिक आस्था राष्ट्रपति पद पर तिरोहित नहीं की जा सकती। आज राष्ट्रपति की बार-बार विदेश यात्रा पर किसी को आश्चर्य नहीं होता।

नेहरू सोमनाथ मंदिर के पक्ष में नहीं, लाड़-प्यार में ही राजेन्द्र बाबू का पालन-पोषण

1962 के भारत-चीन के युद्ध के बाद प्रसाद भी खासे नाराज थे। वह बेशक अवकाश प्राप्त कर चुके थे लेकिन पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी जनसभा को संबोधित करते हुए वह खासे गुस्से मेंं देखे गए जबकि उनके बारे में कहा जाता था कि वह कभी गुस्सा नहीं करते। वह नेहरू और तत्कालीन रक्षा मंत्री वी. के. मेनन पर सभी जमकर बरसे। नेहरू नहीं चाहते थे कि वह ऐसा करें। वह भयभीत थे कि अगर डॉ. प्रसाद ने खुलकर सरकार का विरोध किया तो मुसीबत पैदा हो जाएगी। खुद नेहरू उन्हें मनाने पहुंचे थे। तब राजेंद्र बाबू शांत रह गए थे। 1963 में राजेंद्र बाबू की मृत्यु पटना में हुई। नेहरू अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए। हालांकि वह बाद में शोकसभा में पहुंचे। हो सकता है कि उसकी कोई खास वजह रही हो लेकिन इसे बेशक खराब तौर पर ही लिया गया।

तब गांधी जी को नहीं मालूम था कि ये राजेंद्र प्रसाद का घर है….
गांधी जी पटना में अगर किसी के घर पहली बार पहुंचे थे तो वह राजेंद्र प्रसाद जी का ही घर था, लेकिन न तो राजेंद्र प्रसाद जी को उनके अपने घर आने का पता था और न ही घर में गांधी जी का यथोचित सत्कार ही हो पाया। हां, अगर राजेंद्र जी को पता होता तो तस्वीर अलग होती।
हुआ ये कि लखनऊ में 1916 में कांग्रेस का अधिवेशन था। गांधी जी ने उसमें जाने का फैसला किया। तब कांग्रेस के लिए भी वह कमोवेश नए जैसे ही थे। जब वह वहां पहुंचे तो उन्हें राजकुमार शुक्ला नाम का एक निराश किसान मिला। वह वहां गया था ताकि कांग्रेस के नेताओं को नील किसानों की दुर्दशा के बारे में बता सके। किसी ने भी उसकी बात ध्यान से नहीं सुनी। संयोग से उसे गांधी जी मिल गए। उसने गांधी जी को किसी तरह चंपारण जाने के लिए मना लिया। हालांकि गांधी जी ने बहुत कोशिश की वह वहां नहीं जाएं। लेकिन राजकुमार शुक्ला ने उन्हें मना ही लिया।
वर्ष 1917 में गांधी जी कोलकाता से पटना पहुंचे। उनके साथ शुक्ला भी था। पटना में गांधी जी को कहीं ठहराया जाना था। शुक्ला उन्हें अपने जान-पहचान के वकील राजेंद्र प्रसाद के घर ले गया। राजेंद्र प्रसाद पटना के जाने माने वकील थे, अपनी सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और वकालत के अपने अकूत ज्ञान के लिए विख्यात थे। शुक्ला का उनके घर आना जाना था। इसी कारण वह राजेंद्र प्रसाद के नहीं होने पर भी वहां के नौकरों को गांधी जी के वहां ठहरने के लिए मना पाया।
इंतजाम संतोषजनक नहीं था। गांधी जी को शर्तों पर शरण दी गई थी। वो घर के अंदर के शौचालय का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे। घर के कुएं से पानी नहीं ला सकते थे। नौकर गांधी जी की जाति के बारे में नहीं जानते थे, उन्हें डर था कि उनकी बाल्टी से छलका पानी घर को दूषित कर सकता है। गांधी जी इस पर नाराज हुए लेकिन कर क्या सकते थे। इसके ठीक एक साल बाद कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी और राजेंद्र प्रसाद जी पहली बार मुलाकात हुई। वहां दोनों करीब बैठे। लेकिन उन्हें तब भी नहीं मालूम था कि चंपारण जाते समय गांधी जी पटना में उनके घर पर ठहरे थे। जब उन्हें ये बात मालूम हुई तो बहुत लज्जित भी हुए। इसके बाद गांधी जी उनका जो संपर्क हुआ तो वो हमेशा बना रहा औऱ प्रगाढ़ भी होता रहा।

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