SC-ST बच्चियों को स्कूल छोड़ने से रोकने के लिए चलाई गई योजना का बजट मोदी सरकार ने 99.1% घटाया

मोदी सरकार ने ‘माध्यमिक शिक्षा की राष्ट्रीय प्रोत्साहन योजना (NSIGSE)’ के बजट को 99.1% घटा दिया है। इस योजना के तहत 8वीं पास करने वाली अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की छात्राओं को स्कॉलरशिप दी जाती थी, ताकि वो पढ़ाई न छोड़ें। सरकारी आंकड़े के अनुसार, हर साल 8वीं में पढ़ने वाली तीन लाख से ज्यादा छात्राओं को 9वीं की पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। सरकार ने 2017-18 में जब इस योजना का बजट बढ़ाया था, तब पढ़ाई छोड़ने वाली छात्राओं में एक तिहाई की भारी कमी आई थी। साल 2020 में जब कोरोना महामारी के वक्त SC-ST बच्चियों की पढ़ाई अधिक खतरे में है, तब सरकार ने इसका बजट घटा दिया है।

कुल छात्राओं में 13.6% ही SC-ST, आबादी है 28% से ज्यादा
RTE फोरम के अनुसार, देश में 11 से 14 साल की 16 लाख लड़कियां स्कूल नहीं जातीं। इनमें SC-ST की माध्यमिक शिक्षा के लिए जाने वाली छात्राओं की हालत सबसे खराब है। इस वक्त 6वीं से 10वीं कक्षा तक देश में कुल छात्राओं में SC-ST बच्चियों की भागीदारी महज 13.6% है। इनमें 18.6% SC और 8.6% ST हैं। जनसंख्या में SC-ST की भागीदारी 28% से ज्यादा है। यानी आज भी 50% से ज्यादा SC-ST बच्चियां 9वीं कक्षा तक नहीं पहुंच पातीं। ऐसी बच्चियों की संख्या कम हो, इसी उद्देश्य के साथ 2008 में यह प्रोत्साहन योजना शुरू हुई थी।

पहला बजट था 20 लाख, बढ़ाकर करना पड़ा 24.20 करोड़
2008 में सरकार ने प्रोत्साहन योजना के लिए 20 लाख रुपए का बजट रखा था, लेकिन इस साल जब 9वीं में एडमिशन हुए तो सरकार के अनुमान से कई गुना ज्यादा SC-ST छात्राओं ने स्कूल में नाम लिखवाया। सरकार को बजट बढ़ाकर 24.20 करोड़ रुपए करना पड़ा। नीचे देखिए 2008 से अब तक इस योजना को कितना बजट मिला-

सरकार ने 2019-20 में योजना का बजट 100 करोड़ रुपए रखा, लेकिन खर्च 8.57 करोड़ रुपए कर पाई। अगले साल यानी 2020-21 में 110 करोड़ का बजट घोषित तो किया, लेकिन खर्च एक करोड़ ही हुए। इस योजना के लिए 2021-22 का अनुमानित बजट एक करोड़ है। इस साल कितनी SC-ST छात्राएं 9वीं में जाएंगी, इसका पुख्ता आंकड़ा मौजूद नहीं है, लेकिन 2019 तक हर साल करीब 27 लाख SC-ST छात्राएं 9वीं में प्रवेश ले रही थीं। अगर योजना के तहत हर छात्रा को तीन हजार की स्कॉलरशिप दी जाए तो भी 800 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट चाहिए होगा।

इस योजना से कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं को भी लाभ होता है। 31 मार्च 2020 तक देश में 625 कस्तूरबा विद्यालय थे, जिनमें 65 हजार 249 छात्राएं थीं। इनमें SC-ST छात्राओं के अलावा अन्य वर्ग की छात्राएं कम पढ़ती हैं।

RTE फोरम में डॉक्यूमेंटेशन कॉर्डिनेटर मित्र रंजन कहते हैं, ‘माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट होने का आंकड़ा सबसे ज्यादा होता है। अगर इस स्तर पर पढ़ाई छूटे तो उनका फिर से स्कूली शिक्षा पूरी कर पाना बहुत मुश्किल होता है। यही वजह थी कि अनुसूचित जाति/ जनजाति की स्टूडेंट्स के लिए मैट्रिक पूर्व छात्रवृत्ति योजना की जरूरत थी।’

2017-18 में जब सरकार ने बजट बढ़ाया तब 32% कम छात्राओं ने स्कूल छोड़ा
2016 के एक आंकड़े के अनुसार, देश में 11 से 17 साल तक की कुल SC-ST लड़कियों की आबादी 2 करोड़ 90 लाख थी। उनमें 6वीं से लेकर 10वीं तक कुल 1 करोड़ 43 लाख पढ़ रही थीं। यानी 50% से ज्यादा लड़कियां माध्यमिक शिक्षा के लिए स्कूलों में नहीं थीं। 2017-18 में जब सरकार ने योजना का बजट 711% बढ़ाया था, तब 9वीं ही नहीं इसका असर छठी कक्षा से लेकर 10वीं तक नजर आया था।

योजना के लिए 9वीं में नाम लिखाने वाली SC-ST छात्राएं पात्र हो जाती हैं, लेकिन इसका लाभ 10वीं पास करने के बाद मिलता है। इसलिए 10वीं में भी इस योजना का असर पड़ता है।

इस खास साल में 7वीं में 52% तक कम लड़कियों ने स्कूल छोड़ा था। 8वीं में भी पहले से ज्यादा छात्राएं पहुंचीं।

इस योजना से इसी सरकार को सकारात्मक नतीजे मिल रहे थे फिर इस साल बजट घटाने की क्या वजह रही? ये सवाल स्कूली शिक्षा की सेक्रेटरी अनिता करवाल से पूछा तो उन्होंने ऑफिस खुलने पर जवाब देने की बात कही। मानव संसाधन और विकास मंत्रालय (HRD) के ऑनलाइन उपलब्‍ध नंबर पर फोन किया तो उन्होंने ‘आज छुट्टी है’ कहकर फोन काट दिया। योजना को हर जिले में DEO लागू करते हैं। भोपाल के DEO नितिन सक्सेना ने बताया कि योजना चालू है, लेकिन अभी अधिक जानकारी नहीं दे पाएंगे।

15 फरवरी, 2018 की दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर के मुताबिक HRD मंत्रालय के आदेश पर राजस्‍थान के तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा निदेशक नथमल डिडेल ने सभी DEO को इस योजना की अग्रिम कार्रवाई बंद करने के निर्देश दिए थे। तत्कालीन DEO (माध्यमिक) नरेश डांगी ने कहा था, ‘बीते सालों में योजना में पात्र बालिकाओं को लाभ नहीं मिला है, उन्हें मैचुरिटी भुगतान कराने के लिए निदेशालय सूचना भेज रहे हैं।’

संसदीय समिति भी जता चुकी चिंता
स्कूल शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (UDISE) के 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक 21.8% SC और 22.3% ST स्टूडेंट्स माध्यमिक शिक्षा के दौरान अपनी पढ़ाई छोड़ देते थे।

पिछले साल संसदीय समिति ने इस पर चिंता जताई थी और एजुकेशन डिपार्टमेंट से SC/ST समुदाय के स्टूडेंट्स और लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने की वजहों का सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक वजहों का अध्ययन करने को भी कहा था। उन्होंने माध्यमिक स्तर पर बढ़ते ड्रॉपआउट पर जोर देते हुए इसे रोकने की रणनीतियों और बढ़ते ड्रॉपआउट की वजहों को खत्म करने को कहा था।

एकलव्य स्कूल और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप बढ़ाने पर सरकार का जोर
केंद्रीय बजट 2020-21 में SC-ST स्टूडेंट्स के लिए 750 एकलव्य आवासीय स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा गया है। एक स्कूल खोलने का बजट 20 करोड़ से बढ़ाकर 38 करोड़ रुपए कर दिया गया है। अगर स्कूल पहाड़ी इलाके में खुलता है, तो बजट 48 करोड़ होगा। अभी तक 566 एकलव्य स्कूल खोलने की अनुमति मिल चुकी है। इनमें से 285 ही चल रहे स्कूलों में 73,391 स्टूडेंट पढ़ रहे हैं।

इसके साथ SC स्टूडेंट्स को दी जाने वाली पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम पर 2025-26 तक 35,219 करोड़ रुपए खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का कहना है कि इस बजट में बढ़ोतरी की गई है। जबकि मित्र रंजन कहते हैं, ‘सरकार रिवाइज्ड बजट से बढ़ोतरी की बात कर रही है। पिछले आवंटन से इसमें कमी आई है। इसके अलावा जब माध्यमिक स्तर पर ही बच्चियों की पढ़ाई छूट जाएगी तो उच्चतर स्तर पर स्कॉलरशिप का बजट बढ़ाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

वहीं SC-ST छात्राओं को दी जाने वाली इस स्कॉलरशिप में कई सालों तक बढ़ोतरी के बाद तेजी से कमी की गई। संसदीय समिति ने इस पर चिंता जताते हुए कहा था कि यह स्कॉलरशिप हाशिए पर जी रहे समुदाय के स्टूडेंट्स के लिए बहुत ही जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल SC/ST समुदाय से आने वाले हर पांच में से एक स्टूडेंट को माध्यमिक शिक्षा के दौरान पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। यानी 100 में से 20 को स्कूल छोड़ना पड़ता है।

मित्र रंजन कहते हैं, ‘नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जेंडर इंक्लूजन फंड बनाने की बात भी कही गई, लेकिन बजट कुछ और ही बयां कर रहा है। शिक्षा बजट में 6 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे फ्लैगशिप प्रोग्राम तक किसी अन्य योजना के साथ मिला दिए गए हैं। इससे लड़कियों की शिक्षा पर बहुत बुरा असर होना है।’

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