अभिनन्दन का अभिनन्दन

युद्ध किसी मसले का स्थायी समाधान नहीं है, मगर यह भी सत्य है कि इसके बगैर काम चलता भी नहीं।

प्राचीन से आधुनिक काल उद्भभव – विकास और विनाश सब इसी के गर्भ विषामृत है।

                 क्या शांति का प्रयास मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने नहीं किया? मगर दुष्ट रावण सुधरा-समझा और ऊपर गया युद्धशंखनाद से ही। 

               सोलह कलाओं से युक्त भगवान श्रीकृष्ण से ज्यादा प्रयास किसने किया है "शांति" के लिए, खुद शांतिदूत बनकर गए, अपमान गरल पिये, सबों से आरजू-विनती, अनुनय - विनय किया, मगर सब निरर्थक, निष्फल साबित हुआ। 

दुराचारी दुर्योधन युद्ध की ही भाषा से परलोक गया – शांति के प्रवचन से नहीं।

               अंग्रेज भारत से गए शांतिमंत्र सुनकर नहीं, बलिदानों की अनवरत आहूति, संघर्ष की पराकाष्ठा और मुश्किल है अब रहना, तभी यहाँ वापस लौटे। 

             हम शांति वादियों से पूछना चाहते हैं पिछले सत्तर सालों से भारत की कौन सी ऐसी सरकार बनीं है, जिसने शांति के समुचित प्रयास नहीं किये हैं, हम आजाद भारत में रोज ही अपने निर्दोष जनता और सैनिकों के बलिदान की कहानी पढ़ते, देखते और सुनते हैं। 

हमारे देश के सभी नागरिक, चाहे किसी जाति-धर्म-मजहब का हो शांति – सौहार्द और भाईचारे में विश्वास रखता है, मगर राजनीति तुष्टिकरण और खुदको पुष्टिकरण के क्रम में हिंसा-वैमनस्यता के बीज बोकर, निरन्तर खाद-पानी देकर सुलगाये रखना चाहते हैं, ताकि नेतागीरी की दुकानदारी चलती-चमकती रहे।

                 चरैरवेति चरैरवेति चरैरवेति के मंत्र को आत्मसात करते हुए, भारत इस मुकाम पर पहुँच गया है, जो अब किसी से भी, कहीं पर  भी, किसी रुप में भी टकराने का कुब्बत रखता है। 

           हमारे पड़ोसी मुल्क जिस भाषा में सीखना और सुधरना चाहेंगे, भारत-भारती इसके लिए तैयार है। 

बस कुशल नेतृत्व, मजबूत सरकार और संपूर्ण समर्थन दीजिए, सिंहासन के सितारे देश की दशा और दिशा दोनों बदल देंगे।

                माँ भारती के महान सपूत, परमवीर टिपु सुल्तान अक्सरहाँ कहा करते थे - *गधे की तरह सौ वर्ष जीने की अपेक्षा, शेर की तरह एक दिन ही जिया जाय। 
              हिन्दी के यशस्वी कवि दिनकर जी के शब्दों में - - 

आग के साथ आग बन मिलो
और पानी के साथ पानी
गरल का उत्तर है प्रतिगरल
यही कहते जग के ज्ञानी

         अंहिसा परमो धर्म:धर्महिंसातथैव च

वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,

जाने दो उनको स्वर्गधीर।

पर लौटा दो हमें गांडिव गदा

लौटा दो अर्जुन भीम वीर।।

           शांति और युद्ध दोनों ही जीवन और मृत्यु के समान अटल और आवश्यक हैं। 

           जहाँ शांति को कमजोरी, नम्रता को कायरपन और सहनशीलता का खिल्लीपन उड़े, वहाँ शक्ति प्रदर्शन परमाश्यक है, भारत ने यही किया है, यही करना चाहिए और यही भविष्य में करेगा भी, यही अधिकांशत:जन-गण-मन की भाषा - भावना भी है।

जंग हमारी लाचारी थी

      हमने चाहा सदा अमन

भारत माँ के महान सपूतों

     वीर जवानों तुम्हें नमन

डॉ विजय शंकर,
सहायक शिक्षक,
आर एल सर्राफ उच्च विद्यालय,

देवघर, झारखंड।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social Media Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
Become a Journalist
Feedback/Query