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Saturday, June 19, 2021
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चुनाव के नतीजे आने के बाद राजनीतिक हिंसा का मामला तूल पकड़ गया.
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थोड़ा रुक जाना

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होली है आज
थोड़ा रुक जाना

होली है आज
थोड़ा रुक जाना।
निहार लेना हर तरफ़,
तू है तो
मेरे खुशियों का नहीं ठिकाना
होली है आज
थोड़ा रुक जाना।

दो मिठे बोल चाहिए,
एक मंद मुस्कान बिखेर देना
समझकर तुम्हारी खुशी,
बन चिड़िया चुगूंगा दुख दाना
होली है आज
थोड़ा रुक जाना।।

मालूम, है वक्त की कमी
बस नज़रों में नमी बनाए रखना
सुनने के लिए बेताब तेरी बहन,
बस हालचाल पूछ लेना।
होली है आज
थोड़ा रुक जाना

मासूम तु मालूम है मुझे,
रफ़्तार थोड़ी अपनी कम कर लेना
मौत पर मातम मनाने से अच्छा है
खुशियों में शामिल हो जाना।
होली है आज
थोड़ा रुक जाना।

सब जानते हैं सबकुछ,
करना फिर भी हर काम पूछ-पूछ
खिल जाती बाछें मां-बाप
औलाद की खुशी उसका ठिकाना
होली है आज
थोड़ा रुक जाना।

थोड़ा शब्दों का रंग मल देना,
बड़ों के चरणों को चूम लेना
थपकी लगाना प्यार से,
होठ-नज़रों को पढ़ लेना
होली है आज
थोड़ा रुक जाना।।

झूम उठा था मैं भी,
ज़मीं पर जब तू उतरा।
मनाया था जश्न-ए-आम,
तू सरेआम न भूल जाना
होली है आज
थोड़ा रुक जाना।।

डॉ विजय शंकर
मधुश्री भवन
बंपास टाउन
बी देवघर।।
( बस चाय पीते-पीते,गम को पीकर, खुशियों को बिखेर देते, ऐसे मां-बाप, भाई-बहन, दोस्त और श्रवण पुत्र के पावन चरणों में समर्पित सद्य:स्फूर्त यह काव्यांश)

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