ऑटो ड्राइवर देसराज की कहानीः पोती को पढ़ाने के लिए बेचा घर

सोशल मीडिया में लोगों की जिंदगी बदल देने की ताकत है। हाल की कई घटनाओं ने इस बात को बेहद मजबूती के साथ साबित किया है। दिल्ली के मालवीय नगर के बूढ़े बाबा के ढाबे पर कोई ग्राहक नहीं आता था। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने उनकी इतनी मदद की कि वह एक शानदार रेस्ट्रॉन्ट के मालिक बन गए। ऐसे ही मुंबई में ऑटो चलाने वाले देसराज की कहानी भी सोशल मीडिया के जरिए ही लोगों तक पहुंची। इस कहानी ने सबका दिल छू लिया। लोगों ने देखा कि जिंदगी अपने कितने बदतर रूप में भी हिम्मत और जुनून के सहारे कितनी सुंदरता से संवारी जा सकती है। देसराज ने अपनी पोती को पढ़ाने के लिए घर बेचा दिया और अपने उसी ऑटो को घर बनाकर उसमें रहने लगे, जिसे चलाकर वह कमाई करते हैं।

कुछ दिनों पहले देसराज ने ‘ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे’ को एक इंटरव्यू दिया था। इस इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनके दो बेटे थे। पहला बेटा घर से काम के लिए निकला था लेकिन वापस नहीं लौटा। बाद में उसका शव बरामद किया गया। उनके ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था। अभी वह इससे संभलते कि उनके दूसरे बेटे ने आत्महत्या कर ली। देसराज ने बताया कि उनके बेटे के आत्महत्या करने के बाद उसकी पत्नी ने अपने बेटों को छोड़ दिया। फिर देसराज ने उनकी जिम्मेदारी उठाई।

देसराज कहते हैं कि उन्होंने अपने पोते-पोतियों को बताया कि शिक्षा महत्वपूर्ण है। इसलिए ही उन्होंने अपने सभी पोते-पोतियों को अच्छी शिक्षा देने का संकल्प लिया। उनकी सबसे बड़ी पोती दिल्ली में पढ़ाई करती है। बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करने भर की कमाई देसराज की नहीं थी। ऐसे में उन्होंने अपने पूरे परिवार को गांव भेज दिया। वहां एक स्कूल में उनके सभी पोते पढ़ाई करते हैं। देसराज की आर्थिक हालत को देखते हुए स्कूल के प्रिंसिपल ने उनके बच्चों की फीस माफ कर दी है।

देसराज की बड़ी पोती ने इंटरमीडिएट में 80 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। इससे देसराज का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्होंने बताया कि इसके बाद उनकी पोती ने दिल्ली के एक कॉलेज से बीएड करने की इच्छा जताई थी। उसे वहां भेजने का उनका सामर्थ्य नहीं था। इसलिए उन्होंने अपना झोपड़ा एक लाख रुपये में बेच दिया। वह अपने ऑटो में ही रहने लगे। वह उसी में खाते और सोते भी हैं। देशराज बताते हैं कि वह ये सब तकलीफ अपने पोते-पोतियों को पढ़ाने के लिए उठा रहे हैं। जब उनके पास उनकी पोती का फोन आता है तो वह सब दुख-दर्द भूल जाते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि वह अपने क्लास में फर्स्ट आई है, तब वह गर्व से भर जाते हैं। देशराज ने बताया कि इंटरमीडिएट में जब उनकी बड़ी पोती ने 80 प्रतिशत अंक हासिल किए तब उन्होंने दिन भर लोगों को फ्री राइड दिया था। उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि उनकी पोती शिक्षिका बने।

लॉकडाउन की वजह से देशराज की आय पर काफी असर पड़ा है। उन्होंने बताया कि पूरे लॉकडाउन में वह ऑटो चलाते रहे। उन्होंने कई कोरोना मरीजों को भी अस्पताल पहुंचाया। उन्होंने बताया कि पहले वह 700-800 रुपये हर दिन कमा लेते थे लेकिन अब वह सिर्फ 300-400 रुपये प्रति दिन ही कमा पाते हैं। वह महीने में औसतन 10 हजार रुपये कमा लेते हैं। इसमें से वह अधिकांश अपने पोती के पास भेज देते हैं। बाकी हिमाचल प्रदेश के अपने गांव में परिवार के पास भेज देते हैं। उनकी पत्नी भी गांव में काम करती हैं।

देशराज ने बताया कि वह साल 1958 में मुंबई आए थे। 10वीं तक की पढ़ाई उन्होंने यहीं की। साल 1985 में उन्होंने रिक्शा चलाना सीखा और शुरू किया। बीते एक साल से देशराज अपने ऑटो में सोते और खाते हैं। जब सवारी नहीं होती तो वह अपने ऑटो में ही बैठे रहते हैं। आर्थिक रूप से कमजोरी की मार झेल रहे देशराज बेहद दिलदार हैं। वह बताते हैं कि कभी-कभार जब उन्हें ज्यादा कमाई होती है वह इसे फुटपाथ पर रहने वाले लोगों में बांट देते हैं। उनके साथ ऑटो ड्राइवर उनकी बेहद इज्जत करते हैं।

‘ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे’ ने सोशल मीडिया पर देसराज की कहानी शेयर की थी। इसके बाद कई लोगों ने उनके लिए क्राउड फंडिंग शुरू की थी। फंडिंग के लिए 20 लाख रुपये का टारगेट रखा गया था लेकिन देशराज के नाम पर लोगों ने दिल खोलकर दान दिया। फंडिंग के जरिए देसराज को 24 लाख रुपये मिल गए।

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