इलाज से परहेज रखना कहीं ज्यादा अच्छा

अपने आप को चुस्त−दुरुस्त व स्वस्थ रखने के लिए हमें आहार विहार में निम्नलिखित बातों का खास ध्यान रखना चाहिए एवं अपने जीवन में इन बातों पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए। फिर ही इन समस्याओं से बचा जा सकता है।

आप सब ने अंग्रेजी की इस प्रसिद्ध कहावत को जरूर सुना होगा कि Precaution is better than cure अर्थात इलाज से परहेज रखना कहीं ज्यादा अच्छा है या यों कह सकते हैं कि परहेज युक्त जीवनशैली ही हमारे निरोगी तन व मन का मूल मंत्र है। इसलिए आयुर्वेद में यहाँ पर चिकित्सा की बात की गई है वहीं पर पथ्य पर भी उतना ही बल दिया गया है। सज्जनों आप को यह जानकर भी बहुत ही आश्चर्य होगा कि इस मुहावरे का मूल सूत्र सेहत की रक्षा की प्रेरणा देने वाली भारती संस्कृति के महान एवं संसार के सब से प्रसिद्ध ग्रन्थ आयुर्वेद में मिलता है। विश्व में आयुर्वेद ही एक ऐसी प्रणाली है जिसमें चिकित्सा का भाव रोगों को दूर करना नहीं बल्कि स्वास्थ्य की रक्षा करना भी है

प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य

रक्षणामतुरस्य विकार प्रशमनं च।। (चरक संहिता सूत्र)

आजकल रोगों को दूर करने के लिए बेशक इलाज के बहुत से तरीके उपलब्ध हैं परंतु आयुर्वेदिक चिकित्सा की यह खास विशेषता है कि अगर हम अपने रहन-सहन की आदतों को सही कर लेंगे तो बहुत सारे रोगों से बचाव कर सकते हैं। किस मौसम में क्या खाना चाहिए एवं क्या नहीं खाना चाहिए इत्यादि नियमों का पालन करने के लिए आयुर्वेद में बहुत जोर दिया गया है। उन्होनें तो यहाँ तक कह दिया−

संक्षेपतः क्रियायोगे निदानपरिर्जनम्।।

अर्थात जिन कारणों से रोग हो रहा हो उस कारण को ही त्याग देना चाहिए। मान लीजिए आप के घर में किसी तरफ से पानी आ रहा है। आप बार−बार कमरे में पोचा लगा रहे हो परंतु तब तक पोचा लगाने से कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा जब तक आप पानी के मूल स्रोत को बंद नहीं कर देंगे। ठीक इसी प्रकार हमारे रहन−सहन की गलत आदतों एवं खानपान से हमारे शरीर में बहुत सारे रोग पैदा हो जाते हैं। अगर इनको ठीक कर लिया जाए तो हमें बहुत से लाभ मिल सकते हैं। यही कारण है कि आयुर्वेद के अंदर किसी भी रोग के मूल कारणों को जानने के पश्चात ही इसका इलाज शुरू किया जाता है एवं मौसम के अनुसार ही खान−पान अपनाने की खास हिदायतें दी जाती हैं।

एक साल में छह ऋतुएं होती हैं। जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है तो इन ऋतुयों में बदलाव आ जाता है। जब भू−मध्य रेखा से उत्तरी धुव्र तक के क्षेत्र की दूरी सूर्य के नजदीक होती है तो इसे उतरायण माना जाता है। जिस समय भू−मध्य रेखा से दक्षिणी धुव्र की दूरी ज्यादा होती है तो उस क्षेत्र में सूर्य को दक्षिणायण माना जाता है। इन ऋतुयों का हमारे शरीर पर भी अलग−अलग तरह का प्रभाव पड़ता है। इसलिए आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्रों में यह बात विस्तार पूर्वक बताई गई है कि किस मौसम में कैसा भोजन खाकर अपने−आप को निरोगी रखा जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार सदिर्यों में हमारे शरीर में कफ का आधिक्य हो जाता हैं और यह बढ़ा हुआ कफ हमारे शरीर में जम जाता है। बसंत ऋतु में इसका हमारे शरीर में प्रकोप हो जाता है। इसके द्वारा खाँसी, जुकाम, गले में कफ या बलगम का गिरना, दमा एवं और सांस से संबंधित बहुत सारे रोग पैदा हो जाते हैं। इसलिए अगर हम अपने जीवन में कुछ बातों का ध्यान रखें तो इन बीमारियों से काफी हद तक अपना बचाव कर सकते हैं।

खाने में कफदायक गुणों वाले भोजन पदार्थों से कफ बढ़ता है जैसे−

1. चिकने एवं तले हुए भोजन एवं ठंडी मीठी चीजों का ज्यादा सेवन करना।

2. भोजन सही समय पर न करना या रात को देर से खाना।

3. ज्यादा खाना एवं खाना खा कर लेट जाना।

4. खट्टे रसों या खट्टे पदार्थों का ज्यादा सेवन करना। बहुत ज्यादा ठंडा पानी पीना।

5. खाने के बाद जंक फूड या और बाजार की बनी खट्टी तली चीजों का सेवन करना।

6. जंक फूड य फास्ट फूड का ज्यादा सेवन करना।

7. पोषक भोजन पदार्थों की बजाय सिर्फ स्वाद के लिए कुछ भी अनाप−शनाप खा लेना

8. मैदे से बने भोजन पदार्थों का ज्यादा सेवन करना।

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व्यवहारिक कारण−

1. सवेरे देर तक सोना या लेटे रहना।

2. सारा दिन किसी एक स्थान पर बैठे रहना।

3. बिलकुल भी कसरत या सैर न करना।

4. दिन में भी सोए रहना।

5. कम मेहनत करना एवं ज्यादा सुख सुविधा में जीवन व्यतीत करना।

कफ बढ़ने के लक्षण−

1. शरीर में हमेशा एक भारीपन सा बना रहना।

2. भूख कम लगना, सारा दिन आलस्य आते रहना।

3. बार−बार सर्दी जुकाम का हो जाना, गले में कफ गिरते रहना।

4. खांसी लगना, मुँह का स्वाद मीठा रहना, पेट भरा−भरा रहना।

5. सिर में भारीपन रहना, शरीर में जकड़न पैदा होना।

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अपने आप को चुस्त−दुरुस्त व स्वस्थ रखने के लिए हमें आहार विहार में निम्नलिखित बातों का खास ध्यान रखना चाहिए एवं अपने जीवन में इन बातों पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए। फिर ही इन समस्याओं से बचा जा सकता है।

1. भारी, चिकने तले एवं मिठाई इत्यादि जैसे पदार्थों का प्रयोग कम से कम अथवा नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कफ को बढाते हैं।

2. घर में बना ताजा, गर्म एवं हल्का भोजन करना चाहिए।

3. मौसमी फल सब्जियों का ज्यादा से ज्यादा सेवन करें।

4. ज्यादा सर्दी में नहाने एवं पीने के लिए सदैव गर्म पानी का प्रयोग करना चाहिए।

5. अगर गले में कफ गिरता हो तो तुलसी के पत्तों को पानी में उबालकर उसके गरारे करने चाहिए।

6. रात का भोजन सोने से दो घंटे पहले कर लेना चाहिए।

7. सुबह समय पर उठकर व्यायाम, सैर एवं प्राणायाम करना बहुत ही लाभकारी होता है।

8. अगर हो सके तो सप्ताह में कम से कम एक दिन व्रत जरुर रखना चाहिए। इससे हमारी पाचन शक्ति मजबूत होती है एवं हमारे शरीर से जहरीले तत्वों का निष्काशन हो जाता है।

डिस्क्लेमर: इस लेख के सुझाव सामान्य जानकारी के लिए हैं। इन सुझावों और जानकारी को किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशनल की सलाह के तौर पर न लें। किसी भी बीमारी के लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

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