सामना ने लिखा है कि नेताओं का भ्रष्टाचार किसी को नहीं दिखता

मुंबई  : शिवसेना ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी बीजेपी पर निशाना साधा है। सामना ने अपने संपादकीय में लिखा है कि लोकपाल लेकर भी बीजेपी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा पायी। राज्य के पुलिस महानिदेशक हेमंत नगराले ने बयान दिया है कि भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र का एक हिस्सा बन चुका है। जिन्हें ऐसा लगता है कि नगराले का यह बयान धक्कादायक और खलबली मचानेवाला है, वे लोग मूर्खों के नंदनवन में घूम रहे हैं। राज्य के पुलिस महानिदेशक का सहजता से दिया गया ये बयान सत्य कथन है। नगराले ने एक प्रकार से जनभावना ही व्यक्त की है।

भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र का हिस्सा बन चुका है
सामना ने लिखा है कि हम भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं करते। हालांकि, भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र का ही हिस्सा बन गया है। इसलिए सरकारी तंत्र से भ्रष्टाचार को निकालना कठिन हो गया है। नगराले का कहना है कि हम केवल भ्रष्टाचार पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाइयां बढ़ाकर अधिकारियों को भ्रष्ट आचरण से दूर रख सकते हैं। नगराले ने आगे जो कहा वह महत्वपूर्ण है।

‘सरकारी तंत्र से भ्रष्टाचार को सौ प्रतिशत दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए भ्रष्टाचार रोकने के लिए जो कानून बना है उस कानून में भी भ्रष्टाचार पर प्रतिबंध लगाओ ऐसा कहता है। लेकिन भ्रष्टाचार का समूल नाश करो, कोई कानून ऐसा नहीं कहता।’ भ्रष्टाचार हमारे जीवन और राजनीति का एक हिस्सा बन गया है।

लोकपाल के बाद भी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं
सामना ने लिखा है कि अन्ना हजारे ने दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया। बीजेपी ने अन्ना के आंदोलन को हर प्रकार से ताकत मुहैया कराई। आज अन्ना कहीं नहीं हैं और बीजेपी राष्ट्र, राज्य-राज्य में सत्ता में है और भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण वाली अन्ना की मांग को उस समय खुला समर्थन देनेवाली बीजेपी ने भी ‘लोकपाल’ लाकर भ्रष्टाचार पर नकेल नहीं लगाई। क्योंकि भ्रष्टाचार यंत्रणा का ही एक हिस्सा होता है और सत्ता पाने के लिए, टिकाने के लिए और बहुमत खरीदने के लिए भ्रष्टाचार के पैसे की ही जरूरत पड़ती है।

गोगोई पर निशाना
सामना ने लिखा है कि हिंदुस्तान के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने पिछले हफ्ते कहा कि न्यायालय में न्याय नहीं मिलता। इसका मतलब ये हुआ कि न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार है और वह भी इस तंत्र का एक हिस्सा है। लेकिन जिन्होंने ये कहा उन न्या. गोगोई ने सेवानिवृत्त होते ही राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार कर ली, ये भी भ्रष्टाचार है। गुंडे और राजनीतिक कार्यकर्ता वसूली करते हैं तब उन्हें हफ्ताखोर कहा जाता है। लेकिन नेता, अधिकारी और ठेकेदारों की त्रिमूर्ति एक होकर लूटती है। तब इसे मौके के रूप में देखा जाता है।

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