दिल जले , दिमाग जले

दिन ढला , शाम ढली
हर तरफ चिराग जले
चले भी आओ सनम
दिल जले , दिमाग जले।।

  • जिगर के खून से जिसे
    वर्षों मैंने सींचा है
    वो साख-साख जले , गुल जले
    वो बाग जले।। दिन ढला ।।
  • हुई है रोशनी
    हरसू हुए उजाले पर
    आशियाने में मेरे मुद्दत हुए
    चिराग जले।। दिन ढला।।
  • जरा सा चैन भी मिलता
    तो कुछ बयां करते
    मगर यहां मेरे दिल का
    दाग़-दाग जले।। दिन ढला।।
    गजलकार : पारो शैवलिनी

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