जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान : डॉ विजय शंकर

संतों की कोई जाति नहीं होती है,साधुता के अलावा कोई पहचान नहीं होती, निर्माण के अलावा कोई ध्यान नही होता है और दुःख से निकालकर सुखसरिता की ओर ले चलने के सिवाय कोई काम नहीं होता। जैसे-जैसे समझदारी बढ़ती है जनसाधारण की,प्रीति की रीत प्रखर होने लगती है,वाणी मधुवाणी और चित्र तथा चरित्र सभी के लिए सम्मानीय, आचरणीय हो जाती है।

जाति-पाति पूछे नहीं कोई

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हरि को भजे सो हरि सों होई

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जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान
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मोल करो तलवार की पड़े रहन दो म्यान
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भारत ऋषियों, मुनियों, संतों, कवियों की ज्ञानदायिनी पावनधरा है ।
आत्मकल्याण से लेकर जनकल्याण के लिए सदैव समर्पित वसुन्धरा है ।

समस्याओं के महाढ़ेर में भी समाधान का बीजमंत्र ढूँढ़ने वाला धराधाम है ।

मगर विना परीक्षण, विना समर्पण और वर्षों के सतत निरीक्षण किये विना, कभी किसी का महान आदर, सम्मान नहीं किया ।

एकबार स्वीकृति मिल गई, फिर उसकी जाति, पंथ, विचार कभी उसके पथ के काँटें, दीवार नहीं बनते ।

वे सदैव स्तुत्य और पूजित ही रहते हैं।

ऐसे ही संतों के पावनश्रृखंला में, ज्ञानाश्रयी कवियों के अविरल पावनधारा में एक धारा के सूत्रधार रामानन्द के शिष्य संत रविदास (रैदास) भी हैं जिनकी पावन जयन्ती आज है ।

भक्तिकाल को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने” हिन्दी भाषा का स्वर्णयुग भी कहा है

धर्म की श्रेष्ठता भक्तिपरक, भावनापरक मानी गई, जातिगत संकीर्णताओं को दरकिनार कर दी गई ।

रामानन्द के बारह शिष्यों में जिसमें सभी जाति-धर्म के लोग थे, हिन्दी और हिन्दुस्तान तथा हिन्दुत्व के माध्यम से, सर्वजनोपयोगी मानवीय विचारों को, कर्ममय जीवन में उतारकर, जनमानस के कलुषित, कुविचारों, कुसंस्कारों, तुच्छताओं का अपने विशाल और उदात्त विचारों के पावनगंगाजल से प्रक्षालन और कुशल मार्गदर्शन किया ।

संत रविदास का जन्म काशी के आसपास, समय लगभग पंद्रहवीं शताब्दी के आसपास माना जाता है ।
धन्ना और मीराबाई ने उनका नाम आदरपूर्वक लिया है
मीराबाई रैदास की परमशिष्या भी कही जाती हैं ।

रविदास जी ज्ञानाश्रयी कवियों में निर्गुणवादियों के साथ हैं ।
उनकी कविता का मूलस्वर निरीहता, अनन्यता है ।
कबीर की आक्रमता इनमें नहीं है तुलसी की पीड़ा की साफ झलक है, सूरदास की समर्पण और निश्छलता स्षट दृष्टिगोचर होता है

रैदास जी की भावना-भाषा सरल, प्रवाहमयी और गेयता के गुणों से ओत-प्रोत है

उदाहरण स्वरुप देखिए—
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी

प्रभुजीतुम दिपक हम बाती
जाकी जोत जले दिन राती।

आईए हम सभी मिलकर, साथ चलकर, सभी तुच्छताओं से ऊपर उठकर, मानवीय मूल्यों को प्रचारित, प्रसारित करें और एक सशक्त, सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्तम भारत के नवनिर्माण में अपने शक्तियों का शतप्रतिशत उपयोग करें, यही महान कवियों और संतों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

तीरथ गये सो एक फल,

संत मिले फल चारि।

संत गुरु मिले अनेक फल ,

कहे कबीर बिचारी ।

डॉ विजय शंकर.

सहायक शिक्षक

आर एल सर्राफ उच्च विद्यालय देवघर (झारखंड)

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