उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों का विस्तार जरूरी

नई दिल्ली : पिछले बीस सालों में देश के स्कूलों से बड़ी संख्या में बच्चे पास होकर निकल रहे है, लेकिन हमारे विश्वविद्यालयों के पास उन्हें उच्च शिक्षा देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं है। इसलिए उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों की तेजी से विस्तार की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि अबतक भारत का शिक्षा मॉडल बच्चों को संसाधन के रूप में ढाल रहा था, उन्हें टूल के रूप में तैयार रह रहा था, जबकि शिक्षा का असल उद्देश्य बच्चों को एक अच्छा मानव और नागरिक बनाना है, संसाधन नही।

यह बात मंगलवार को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नई शिक्षा नीति के सलाह से बने शिक्षा मंत्रालय का स्वागत करते हुए भारतीय विश्वविद्यालय संघ, उत्तरी जोन द्वारा गुरुगोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय वर्चुअल उपकुलपति संवाद कॉन्फ्रेंस के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में अपने भाषण में व्यक्त की।

इस अवसर पर डॉ. तेज प्रताप, अध्यक्ष भारतीय विश्वविद्यालय संघ, डॉ.पंकज मित्तल, प्रो.महेश वर्मा के साथ-साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों के उपकुलपति भी शामिल थे।

उप मुख्यमंत्री ने कहा, विश्वविद्यालयों को अनुसंधान पर करना होगा फोकस
उप मुख्यमंत्री सिसोदिया ने कहा कि आज हमारे विश्वविद्यालयों के सामने अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती है। अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालयों को अनुसंधानों एवं नवाचारों पर काम करने की आवश्यकता है। अपने पाठ्यक्रमों में उद्यमिता को शामिल करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को यह समझना होगा कि उनका भूतकाल उनका भविष्य नही बन सकता। भविष्य की मांगों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालयों को अपने ढांचे में बदलाव लाना होगा। इसके लिए विश्वविद्यालयों को अनुसंधान पर फोकस करना होगा।

ब्रेन – ड्रेन पर जताई चिंता
उप मुख्यमंत्री सिसोदिया ने कहा कि आज भारत से ‘ब्रेन-ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) हो रहा है। हम भारत की प्रतिभाओं को विदेशी कंपनियों को दान दे रहे हैं।अमेरिका और यूरोप के देश विकासशील देशों की प्रतिभाओं को ढूंढ कर अपने देशों में ले जाते है। हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारे विद्यार्थी उन देशों की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं?

हमारे विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की प्रतिभा निखारने में तो कामयाब हो रहे है, पर राष्ट्र निर्माण में उन प्रतिभाओं को शामिल करने में विफल रहे हैं। हमें हमारे विश्वविद्यालयों के माध्यम से इन प्रतिभाओं को राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनाना होगा।

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