28 फरवरी : डॉ. प्रसाद ने पंडित नेहरू की बात नहीं मानी और 11 मई 1951 को होने वाले कार्यक्रम में उन्होंने हिस्सा लिया

जामताड़ा (सर्च खबर) : पिछले साल 9 नवंबर को भक्तों की आस पर कार्तिक के मास में आखिरकार रामलला का खत्म हुआ था वनवास। सुप्रीम कोर्ट के रामलला के नाम जमीन के हक पर हस्ताक्षर के साथ ही ये तय हो गया था कि अयोध्या में भगवान राम का भव्य और दिव्य मंदिर बनेगा। लेकिन 5 अगस्त 2020 को क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभी अपने भगवान अपने इमामे हिन्द के अद्भूत मंदिर के नींव रखे जाने के साक्षी बने। जिस बात का इतंजार था, जिस तारीख का इंतजार किया जा रहा था आखिर वो तारीख आ गई। 5 अगस्त 2020, जिस दिन अयोध्या में भगवान राम के दिव्य और भव्य मंदिर के लिए भूमि पूजन किया गया। भूमि पूजन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किया गया। अयोध्या का जिक्र होता है तो साथ ही जिक्र राम मंदिर आंदोलन का भी होता है और साथ ही इससे जुड़े किरदारों का भी। रामजन्म भूमि आंदोलन का शंखनाद करने वाली लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा जारी थी, जो अब तीस साल बाद अपनी मंज़िल पर पहुंची। इस रथ यात्रा में सारथी की भूमिका निभाने वाले नरेंद्र मोदी की ख़ामोशी भी अब टूटी। गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक की ये यात्रा अपने मुकाम पर आज पहुंची। लेकिन आज हम आपको अयोध्या से 1753 किलोमीटर दूर गुजरात के सोमनाथ मंदिर की यात्रा पर लिए चलते हैं। जिसे आक्रमणकारियों ने बार-बार आक्रमण कर तोड़ा, कत्लेआम करवाया औऱ लूटा गया। लेकिन साथ ही इसके पुनर्निर्माण की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। जब उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में खुद जाना तो दूर की बात है तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी जाने से रोकना चाहते थे। आजाद भारत के इतिहास में इस मंदिर की वजह से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच गतिरोध भी हुआ था। एक लंबी कहानी है सोमनाथ मंदिर की। इन कहानियों को सुनने के बाद आपको लिए सोमनाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं रहेगा। प्रतीक भी हो जाएगा, जिजिविषा का, संघर्ष का और साथ ही इस संदेश का भी कि पुनर्निर्माण की ताकत हमेशा तबाही की ताकत से बड़ी होती। 

पावन प्रभासक्षेत्र में स्थित सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कन्दपुराणादि में विस्तार से बताई गई है। चंद्रमा का एक नाम सोम भी है, उन्होंने भगवान्‌ शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहाँ तपस्या की थी। अतः इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है।

कई बार हुए थे सोमनाथ मंदिर पर हमले

सोमनाथ मंदिर को बार-बार विदेशी हमलावरों द्वारा लूटा गया। खासतौर पर मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ने और नष्ट करने के लिए गुजरात पर बार-बार हमले किए। कहा जाता है कि सबसे पहले एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर दूसरी बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा। 1022 ईस्वी में राजा भीमदेव सोलंकी ने गुजरात के चालूक्य राज्य की सत्ता संभाली। सोलंकी वंश के इसी राजा के शासनकाल में सोमनाथ के विश्व प्रसिद्ध मंदिर को लूटने व तोड़ने की घटना 1026 ई में घटित हुई थी। करीब 50,000 योद्धाओं के बलिदान के पश्चात ही महमूद गजनवी सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने में सफल हुआ था। उस समय राजा भीमदेव भी उस विदेशी लुटेरे शासक के विरुद्ध आक्रमणकारी के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। वह स्वयं भी युद्धभूमि में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके घायल होने के उपरांत ही महमूद गजनवी मन्दिर विध्वंस के अपने कुकृत्य को करने में सफल हो पाया था। जिसका जिक्र केएम मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘इंपीरियल गुर्जर्स’ में किया है । गजनवी ने मंदिर की संपत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। तब मंदिर की रक्षा के लिए निहत्‍थे हजारों लोग मारे गए थे। ये वे लोग थे, जो पूजा कर रहे थे या मंदिर के अंदर दर्शन लाभ ले रहे थे और जो गांव के लोग मंदिर की रक्षा के लिए निहत्थे ही दौड़ पड़े थे। महमूद के मंदिर तोड़ने और लूटने के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ मंदिर के सौन्दर्यीकरण में योगदान किया था। सन् 1297 में जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर हमला किया तो उसने सोमनाथ मंदिर को दुबारा तोड़ दिया और सारी धन-संपदा लूटकर ले गया। मंदिर को फिर से हिन्दू राजाओं ने बनवाया। लेकिन सन् 1395 में गुजरात के सुल्तान मुजफ्‍फरशाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाकर सारा चढ़ावा लूट लिया। इसके बाद 1412 में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी यही किया। बाद में मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया। 1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर पूजा-अर्चना के लिए सोमनाथ महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया। जूनागढ़ की रियासत के नवाब ने 1947 के पहले अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाने का फैसला किया था। जिसको भारत की ओर से अस्वीकार कर दिया गया और जूनागढ़ को हिन्दुस्तान में मिला दिया गया था। भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र का जल लेकर नए मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। उनके संकल्प के बाद 1950 में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ।

ट्रस्ट का गठन और फंडिंग की कहानी?

बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ मंदिर को लेकर लिखे गए अपने ब्लाग में जिक्र किया था कि दरअसल उस समय सरदार पटेल मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर गांधी जी के साथ ही जवाहर लाल नेहरू का समर्थन हासिल कर चुके थे। गांधी जी चाहते थे कि मंदिर के लिए जो पैसे इक्ट्ठे किए जाएं उसके लिए बकायदा एक ट्रस्ट बनाया जाए। उसमें सरकार की किसी भी तरह से कोई भूमिका नहीं हो। जिसके मद्देनजर बकायदा एक जनधन ट्रस्ट बनाया गया और उसे पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई। कन्हैयालाल मुंशी की किताब ‘पिलग्रिमेज टू फ्रीडम’ में इस मंदिर के पुनर्निर्माण के बारे में विस्तार से लिखा है। मुंशी ने अपनी किताब में लिखा है कि सोमनाथ पुनरुद्धार की घोषणा के बाद कुछ लोगों ने दान किया था। लेकिन गांधी जी के जन धन जुटाने के सुझाव के बाद ‘पटेल ने नवागनर के जाम सा​हब का दान किया एक लाख रुपये का चेक और जूनागढ़ प्रशासन प्रतिनिधि सामलदास गांधी के 50 हज़ार रुपये लौटाए और उन्हें सोमनाथ फंड में दान करने के लिए कहा।

नेहरू ने ‘हिंदू पुनरुत्थान कार्य’ कहकर राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाने से रोका

 सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस बात की घोषणा की कि अब सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। इसके लिए लगातार वो जोर-शोर से लगे भी थे। लेकिन 5 दिसंबर 1950 को उनका निधन हो गया। 5 मार्च 1950 को ट्रस्ट का कामकाज शुरू हो चुका था और महाराजा जामसिंह ने इसका शिलान्यास किया था। लेकिन उसके पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू बिल्कुल भी नहीं चाहते थे कि सरकार का किसी भी तरह का कोई भी दखल मंदिर के निर्माण कार्य में हो। इस बात पर लगातार वो जोड़ देते रहे थे। महाराजा जामसार ने मंदिर का शिलान्यास किया और 1951 तक मंदिर का बेस और गर्भ गृह बनकर पूरी तरह से तैयार हो चुका था। 

पंडित नेहरू का तर्क और राजेंद्र प्रसाद का जवाब 

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक केसी मुंशी ने 1951 में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद का न्योता दिया था। उस वक्त प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने खत लिखकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद से आग्रह किया था कि भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है ऐसे में किसी मंदिर के कार्यक्रम में राष्ट्रपति जाते हैं तो फिर इसका गलत संदेश जाएगा। इसलिए राष्ट्रपति को अपनी सोमनाथ कार्यक्रम के बारे में फिर से विचार करना चाहिए। पंडित नेहरू का तर्क था कि बंटवारे के बाद जिस तरह का माहौल बना था, उसमें सोमनाथ में विशाल मंदिर बनाने पर जोर देने का यह उचित समय नहीं थ। विख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि नेहरू ने प्रसाद को सलाह दी ”वे सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में न जाएं, इसके दुर्भाग्यवश कई मतलब निकाले जाएंगे’। पंडित नेहरू ने इस घटना का ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ कहकर विरोध किया। उस समय नेहरू से हुई बहस को कन्हैयालाल मुंशी ने अपनी पुस्तक पिलग्रिमेज टू फ्रीडम में दर्ज किया है, जबकि केएम मुंशी ने इसे ‘भारत की सामूहिक अंत:चेतना’ का नाम दिया।  वरिष्ठ पत्रकार साकेत गोखले की ट्वीट के अनुसार 2 मई 1951 को पंडित नेहरू सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को खत लिखकर सोमनाथ मंदिर का कार्यक्रम सरकारी कार्यक्रम नहीं है और भारत सरकार का इसमें कोई लेना देना नहीं है। हमें कोई भी ऐसी चीज नहीं करनी चाहिए जो एक सेक्युलर स्टेट के हमारे रास्ते में आड़े आए यही हमारे संविधान का आधार है। इसलिए देश के सेक्युलर करेक्टर को प्रभावित करने वाली किसी भी चीज से सरकार अपने को दूर करती है। हालांकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पंडित नेहरू की बात नहीं मानी और 11 मई 1951 को होने वाले कार्यक्रम में उन्होंने हिस्सा लिया। बकौल रामचंद्र गुहा, राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ में कहा ‘मैं एक हिंदू हूं, लेकिन सारे धर्मों का आदर करता हूं। कई मौकों पर चर्च, मस्जिद, दरगाह और गुरुद्वारा भी जाता रहता हूं’। इसके साथ ही डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने जो कहा उन पंत्तियों के अपने आप में बहुत बड़े मायने हैं। डॉ. प्रसाद ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पुनर्निर्माण की ताकत हमेशा तबाही की ताकत से बहुत बड़ी होती है। 

नेहरू और सेक्युलरिज्म

जिस वक्त डॉ. राजेंद्र प्रसाद और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सेक्युलर स्टेट की परिभाषा बताते हुए सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में जाने से रोकने की हर संभव कोशिश कर रहे थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि सेक्युलर शब्द उस वक्त हमारे संविधान में जुड़ा ही नहीं था और 1976 में 42वें संशोधन के तहत इसे जोड़ा गया। संविधान सभा की बैठक जिसमें पंडित नेहरू, लोकनाथ मिश्रा, एचएन मुखर्जी शामिल थे और ये विषय आया कि अल्पसंख्यक शब्द होगा तो सेक्युलर नहीं हो सकता और सेक्युलर होगा तो अल्पसंख्यक शब्द की कोई जगह नहीं बनती। मजहबी स्टेट में अल्पसंख्यक होते हैं, सेक्युलर स्टेट में नहीं। इसलिए उस वक्त सेक्युलर शब्द नहीं शामिल किया गया। 27 दिसंबर 1963 की बात है श्रीनगर की हजरतबल दरगाह से मू-ए-मुकद्दस (पैगंबर मोहम्मद का बाल) चोरी होने की खबर फैल गई। मू-ए-मुकद्दस की चोरी से बड़ा हंगामा मच गया। पुलिस प्रसाशन की ओर से कहा गया कि मुकद्दस बाल यथावत है किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है। लेकिन तब समुदाय विशेष द्वारा कहा गया कि हम यकीन नहीं करेंगे और इसे हमारी धार्मिक मान्यता से सिद्ध करना होगा। न सरकार की साइंटिफिक टेस्टिंग न कार्बन डेटिंग कुछ नहीं माना गया। कहा गया कि मौलवियों को बुला कर ही फतवा जारी होगा। तभी माना जाएगा। इस मामले को पंडित नेहरू ने व्यक्तिगत रूप से न सिर्फ मॉनिटर किया बल्कि चार्टड प्लेन के द्वारा लोग गए। छह फरवरी, 1964 की उस घटना के बारे में वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा लिखते हैं, ‘फिर मिराक शाह आगे निकलकर आए और उन्होंने पवित्र अवशेष तकरीबन एक मिनट तक अपनी आंखों के सामने रखा फिर अपना सिर हिलाया, फिर धीमी लेकिन साफ आवाज में कहा कि यही मू–ए-मुकद्दस है। इसके साथ वहां जुटी जनता में खुशी की लहर दौड़ गई। यहां पर पंडित नेहरू बड़े नार्मल थे कि धार्मिक मामलों में प्रधानमंत्री को इन्वॉल्व नहीं होना चाहिए। लेकिन मू-ए-मुकद्दस की मॉनिटरिंग और धार्मिक आधार पर सिद्ध करवाने के लिए कृतसंकल्प। 

बहरहाल, जहां तक बात अयोध्या के ऐतिहासिक शिलान्यास और भूमिपूजन की है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन के साथ ही उस घड़ी का भी अंत हो गया जिसका सदियों से इंतजार था। जिसमें सदियों की प्रतीक्षा, कुर्बानी और निर्ममता की कहानी छिपी थी। जब बर्बरता और निर्मम तरीके से हिन्दुओं का कत्लेआम कर अपनी सत्ता कायम करने वाले बाबर जिसके मंदिर तोड़ते वक्त 10,000 से ज्यादा हिन्दू उसकी रक्षा में मारे गए थे। आक्रांता केवल किसी राष्ट्र के पद आक्रांत नहीं करते बल्कि विजित समाज के गौरव और आत्माभिमान को गहरायी से कुचलते हैं। बाबर के सिपहसालार मीर बाकी को अयोध्या जीतने के बाद यदि नमाज ही अदा करनी थी, तो वह कहीं खुले मैदान में नई मस्जिद बनवाकर कर सकता था। मीर बाकी ने श्रीराम मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाने का कृत्य, ना उसकी धार्मिक आवश्यकता थी और ना ही उसे इस्लाम की मान्यता थी। फिर उसने यह क्यों किया! क्योंकि उसे केवल भारतीय आस्था, अस्मिता और गौरव पर आघात करना था। इसलिए, अयोध्या का राम मंदिर महज एक मंदिर नहीं है। वह करोड़ों भारतीयों की कालजयी आस्था और गौरव का प्रतीक है। इसलिए उसका पुर्निनर्माण भारत के सांस्कृतिक गौरव की पुन: स्‍थापना है।

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