धनतेरस के दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरी और यम की पूजा का महत्व

हिंदुओं के सबसे बड़े त्यौहार दीवाली से 2 दिन पूर्व पड़ने वाले धनतेरस के दिन आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। आज ही के दिन भगवान धन्वंतरि अवतरित हुए थे, इसीलिए धनतेरस को ‘धन्वंतरी जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है। दीवाली के पांच दिवसीय त्योहार की शुरुआत धनतेरस से ही हो जाती है जो कि भैया दूज को समाप्त होती है।

वहीं धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मी के साथ ही यम देव की पूजा का भी विधान है। आज के दिन यम देवता की पूजा करने से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।

भगवान धन्वंतरि की कथा

देवता और दानव मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। तब कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ। भगवान धन्वंतरी चार भुजाओं के साथ प्रकट हुए और उनके हाथों में अमृत से भरा हुआ कलश था। इसी अमृत कलश की वजह से देवताओं को अमरत्व की प्राप्ति हुई। भगवान धन्वंतरी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। संसार को आरोग्य दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने धनवंतरी के रूप में जन्म लिया था। भगवान धन्वंतरि देवताओं के चिकित्सक हैं और इनकी पूजा से आरोग्य की कामना की जाती है।

धनतेरस की पूजा विधि

धनतेरस के दिन सबसे पहले घर की साफ -सफाई करके शुभ मुहूर्त में पूजा की शुरुआत करनी चाहिए। आज के दिन भगवान कुबेर जोकि धन- धान्य के देवता हैं, उनकी भी पूजा किये जाने का विधान है। आज के दिन 13 दिए जलाए जाते हैं और धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान धन्वंतरी, भगवान कुबेर और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।

धनतेरस के दिन सोने, चांदी, पीतल के बर्तन खरीदने की परंपरा भी रही है। कहा जाता है कि भगवान धनवंतरी अपने हाथ में कलश लेकर अवतरित हुए थे, इसलिए आज के दिन बर्तनों की खरीदारी की जाए तो भगवान धन्वंतरी प्रसन्न होते हैं और साल भर आपके घर में कृपा बरसती रहती है।

यम देव की कथा

शास्त्रों में धनतेरस के दिन यमराज यानी कि यम देव की पूजा का भी व्याख्यान मिलता है और इससे संबंधित एक कथा बहुत प्रचलित है, जिसमें एक राजा थे जिन्हें संतान नहीं प्राप्त हो रही थी। उन्होंने बहुत अधिक पूजा-पाठ और यज्ञ हवन के बाद संतान की प्राप्ति की। वहीं जब राजा को पुत्र प्राप्त हुआ तो ज्योतिषों ने बताया कि आपके पुत्र का यदि विवाह होगा तो विवाह के 4 दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। ज्योतिषों की बात सुनकर राजा बहुत चिंतित हुए और अपने पुत्र को एक ऐसे स्थान पर निवास करने के लिए भेज दिया जहां किसी भी महिला का आना जाना नहीं होता था।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जहां राजा का पुत्र निवास कर रहा था वहां से अचानक राजकुमारी गुजर रही थी। राजकुमारी को देखकर राजकुमार मोहित हो उठे और दोनों ने आपस में विवाह कर लिया। लेकिन विवाह के 4 दिन बाद ज्योतिष की भविष्यवाणी सच हुई और राजकुमार की मृत्यु हो गई। अपने पति के प्राणों को बचाने के लिए राजकुमारी ने बहुत विलाप किया और यमदूत से आग्रह किया कि उसके पति के प्राण को बख्श दें। तब यमराज ने उस राजकुमारी की दशा को देखकर उसे कहा कि धनतेरस के दिन जो भी प्राणी रात्रि के तीन पहर बीत जाने के बाद मेरा पूजन करेगा और दीया जला कर घर के दक्षिण दिशा में रखेगा तो उसके ऊपर से ‘अकाल मृत्यु’ का भय हट जाएगा। तभी से धनतेरस के दिन रात्रि के तीन पहर बीत जाने के बाद चौमुखी दिया घर के दक्षिण तरफ रखने की प्रथा चली आ रही है।

यम के दीए जलाने की विधि

धनतेरस की आधी रात बीत जाने के बाद यमराज की पूजा की जाती है और इस पूजा में चौमुखी दिए का प्रयोग किया जाता है। अगर आपके पास मिट्टी का चौमुखी दिया नहीं है, तो आप आटे का चौमुखी दिया बनाकर अपने मुख्य द्वार के दाएं तरफ रख दें। ध्यान रहे कि दिए की बाती का मुख दक्षिण की तरफ रहना चाहिए। वहीं दीपक के साथ रोली, चंदन, फूल, जल, चावल और नैवेद्य आदि से पूजा कर भगवान यमराज से अकाल मृत्यु ना हो, इसकी कामना की जाती है।

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