श्रीकृष्ण ही सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए

समस्त देवताओं में श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के एक अवतार हैं। यह अवतार उन्होंने द्वापर युग में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागार में लिया था। उस समय चारों ओर पाप कृत्य हो रहे थे। धर्म नाम की कोई भी चीज नहीं रह गई थी। इसलिए धर्म को स्थापित करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे। श्रीकृष्ण ने तब पापों का नाश करके धर्म की स्थापना तो की ही साथ ही उस काल में महाभारत में भी उनका अमूल्य योगदान रहा। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ अपरमपार हैं। भगवान के जीवन में वैसे तो अनेक लोगों का बहुत अधिक महत्व रहा लेकिन माता यशोदा और श्रीराधा जी के प्रति उनका अपार स्नेह रहा।

माता यशोदा

भगवान श्रीकृष्ण का लालन पालन करने वाली यशोदाजी को हिंदू पौराणिक ग्रंथों में विशेष स्थान प्राप्त है। यशोदा और श्रीकृष्ण की पहले भेंट के बारे में बताया जाता है कि जब यशोदाजी प्रसव पीड़ा सह रही थीं तो अचानक ही सूतिकागृह अभिनव प्रकाश से भर गया। सर्वप्रथम रोहिणी माता की आंखें खुलीं। वे जान गयीं कि यशोदा ने पुत्र को जन्म दिया है। विलम्ब होते देख रोहिणीजी दासियों से बोल उठीं− अरी! तुम सब क्या देखती ही रहोगी? कोई दौड़कर नन्दजी को सूचना दे दो। फिर क्या था, दूसरे ही क्षण सूतिकागार आनन्द और कोलाहल में डूब गया। एक नन्दजी को सूचना देने के लिए दौड़ी। एक दाई को बुलाने के लिए गयी। एक शहनाई वाले के यहां गयी। चारों ओर आनन्द का माहौल हो गया। सम्पूर्ण ब्रज ही मानो प्रेमानंद में डूब गया।

भगवान श्रीकृष्ण ने माखन लीला, उखल बंधन, कालिय उद्धार, गोचारण, धेनुक वध, दावाग्नि पान, गोवर्धन धारण, रासलीला आदि अनेक लीलाओं से यशोदा मैया को अपार सुख प्रदान किया। इस प्रकार ग्यारह वर्ष छह महीने तक माता यशोदा का महल श्रीकृष्ण की किलकारियों से गूंजता रहा। आखिर श्रीकृष्ण को मथुरापुरी ले जाने के लिए अक्रूर आ ही गये। अक्रूर ने आकर यशोदाजी के हृदय पर मानो अत्यंत क्रूर वज्र का प्रहार किया। पूरी रात नन्दजी श्रीयशोदा को समझाते रहे, पर किसी भी कीमत पर वे अपने प्राणप्रिय पुत्र को कंस की रंगशाला में भेजने के लिए तैयार नहीं हो रही थीं। आखिर योगमाया ने अपनी माया का प्रभाव फैलाया। श्रीकृष्ण चले गये तो यशोदा विक्षिप्त−सी हो गयीं। उनका हृदय तब शीतल हुआ, जब वे कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से मिलीं।

भगवती श्रीराधा

भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी श्रीराधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। पद्म पुराण में वृषभानु को राजा बताते हुए कहा गया है कि यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहा था, तब इसे भूमि कन्या के रूप में राधा मिली। राजा ने अपनी कन्या मानकर कन्या का पालन−पोषण किया। श्रीराधा जी के बारे में एक कथा यह भी मिलती है कि भगवान श्रीविष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा तो भगवान विष्णु की अर्धांगिनी लक्ष्मी राधा बनकर पृथ्वी पर आईं। ब्रज में श्रीराधा का महत्व सर्वोपरि है। राधारानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। यहां की लट्ठमार होली विश्व प्रसिद्ध है।

श्रीराधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया। दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से श्रीकृष्ण और वृन्दावन से नंद, राधा आदि गए थे। श्रीराधा भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति हैं। श्रीकृष्ण के प्राणों से ही इनका आविर्भाव हुआ। श्रीकृष्ण इनकी नित्य आराधना करते हैं, इसलिए इनका नाम राधा है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने और श्रीराधा के अभेद का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि श्रीराधा के कृपा कटाक्ष के बिना किसी को मेरे प्रेम की उपलब्धि ही नहीं हो सकती। वास्तव में श्रीराधा कृष्ण एक ही देह हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति और मोक्ष दोनों श्रीराधाजी की कृपा दृष्टि पर ही निर्भर हैं

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