किसान आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार की दोहरी नीति गलत है

मुंबई : दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते हुए शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा गया है की भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों को स्थगनादेश दे दिया है। फिर भी किसान आंदोलन पर अड़े हुए हैं। अब सरकार की ओर से कहा जाएगा, ‘देखो, किसानों की अकड़, सर्वोच्च न्यायालय की बात भी नहीं मानते।’ सवाल सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के मान-सम्मान का नहीं है बल्कि देश के कृषि संबंधी नीति का है।

किसानों की मांग है कि कृषि कानूनों  को रद्द करो। निर्णय सरकार को लेना है। सरकार ने न्यायालय के कंधे पर बंदूक रखकर किसानों पर चलाई है लेकिन किसान हटने को तैयार नहीं हैं। किसान संगठनों और सरकार के बीच जारी चर्चा रोज असफल साबित हो रही है। किसानों को कृषि कानून चाहिए ही नहीं और सरकार की ओर से चर्चा के लिए आनेवाले प्रतिनिधियों को कानून रद्द करने का अधिकार ही नहीं है।

किसानों के इस डर को समझ लेना आवश्यक है।
सामना ने लिखा है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय को आगे करके किसानों का आंदोलन समाप्त कर रही है। एक बार सिंघू बॉर्डर से किसान अगर अपने घर लौट गया तो सरकार कृषि कानून के स्थगन को हटाकर किसानों की नाकाबंदी कर डालेगी इसलिए जो कुछ होगा, वह अभी हो जाए। किसान संगठन ‘करो या मरो’ के मूड में हैं। सरकार आंदोलनकारी किसानों को चर्चा में उलझाए रखना चाहती थी। किसानों ने उसे नाकाम कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कानून पर स्थगनादेश के बावजूद यह ‘पेंच’ नहीं छुटा। सर्वोच्च न्यायालय ने किसानों से चर्चा करने के लिए चार सदस्यों की नियुक्ति की है। ये चार सदस्य कल तक कृषि कानूनों की वकालत कर रहे थे इसलिए किसान संगठनों ने चारों सदस्यों को झिड़क दिया है। सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में कहा गया कि आंदोलन में खालिस्तान समर्थक घुस गए हैं! सरकार का यह बयान धक्कादायक है। आंदोलनकारी सरकार की बात नहीं सुन रहे इसलिए उन्हें देशद्रोही, खालिस्तानवादी साबित करके क्या हासिल करनेवाले हो?

किसानों को बदनाम किया जा रहा है
चीनी सैनिक हिंदुस्थान की सीमा में घुस आए हैं। उनके पीछे हटने की चर्चा शुरू है लेकिन किसान आंदोलनकारियों को खालिस्तान समर्थक बताकर उन्हें बदनाम किया जा रहा है। अगर इस आंदोलन में खालिस्तान समर्थक घुस आए हैं तो ये भी सरकार की असफलता है। सरकार इस आंदोलन को खत्म नहीं करवाना चाहती और इस आंदोलन पर देशद्रोह का रंग चढ़ाकर राजनीति करना चाहती है। तीन कृषि कानूनों का मामला संसद से संबंधित है। इस पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए लेकिन वकील शर्मा मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय में याचक भक्त की भूमिका में खड़े हुए और न्यायालय से हाथ जोड़कर बोले, ‘माय लॉर्ड, अब आप ही परमात्मा हैं। आप ही इस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं। किसान किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हैं!’ लेकिन अब किसान सर्वोच्च न्यायालय रूपी भगवान की भी सुनने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उनके लिए जमीन का टुकड़ा ही परमात्मा है।

सरकार की दोहरी भूमिका पर सवाल
सामना ने सवाल किया है कि एक तरफ किसानों को खालिस्तानी कहना और दूसरी तरफ खालिस्तानी किसानों के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचना करना, ये दोहरी भूमिका क्यों? सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय लाखों किसानों को स्वीकार नहीं होगा तो लाखों किसानों को देशद्रोही साबित करोगे क्या? किसानों का आंदोलन अब अधिक प्रभावी होनेवाला है। २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसान एक बड़ी ट्रैक्टर रैली निकालकर दिल्ली में घुसने का प्रयास करेंगे। ये आंदोलन न होने पाए और माहौल ज्यादा खराब न हो, ऐसा सरकार को लग रहा होगा तो सरकार की भावनाओं को समझना चाहिए। दूसरे के कंधे को किराए पर लेकर किसानों पर बंदूक मत चलाओ। सरकार द्वारा कृषि कानून रद्द किए जाने पर हम वापस घर लौट जाएंगे, किसान बार-बार ऐसा कह रहे हैं। अब तक ६०-६५ किसानों ने आंदोलन में बलिदान दिया है।

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