महाकाल के दर्शन मात्र से ही दूर हो जाते हैं सभी काल

परमात्मा के सिवाय सभी बाहरी वस्तुओं का चिन्तन छोड़कर और आँखों की दृष्टि को भौहों के बीच में केन्द्रित करके प्राण-वायु और अपान-वायु की गति समान करके मन, इन्द्रियों और बुद्धि को वश में करके ध्यान पूर्वक मोक्ष के लिये तत्पर ध्यान योगी सदैव मुक्त हो जाता है।

गीता प्रेमियो ! गीता गायक गोविंद के द्वारा दिया गया यह शाश्वत संदेश हम सबको सदा याद रखना चाहिए… “उम्मीद” और “भरोसा” कभी गलत नहीं होते, ये हमारे निर्णय पर निर्भर करता है कि हमने किससे उम्मीद की और किस पर भरोसा।

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं… पिछले अंक में भगवान ने अर्जुन को समझाया… हे भरतवंशी अर्जुन! तुम अपने हृदय में स्थित अज्ञान और संशय को ज्ञान-रूपी तलवार से काटो, कर्म योग में स्थित हो और मुझ पर उम्मीद तथा भरोसा करके युद्ध के लिए खड़ा हो जाओ।

अब भगवान के मुख से ज्ञानयोग और कर्मयोग इन दोनों की प्रशंसा सुनकर अर्जुन यह नहीं समझ सके कि इन दोनों में कौन-सा साधन मेरे लिए श्रेष्ठ है। इसलिए भगवान से प्रश्न पूछते हैं—

अर्जुन उवाच

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌॥

अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! कभी आप संन्यास अर्थात ज्ञानयोग की बात करते हैं तो कभी कर्मयोग अर्थात् निष्काम कर्म की बात करते हैं, इन दोनों में से एक जो मेरे लिये कल्याणकारी हो उसे कहिए।

श्रीभगवानुवाच

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥

श्री भगवान ने कहा – संन्यास माध्यम से किया जाने वाला कर्म (सांख्य-योग) और निष्काम माध्यम से किया जाने वाला कर्म (कर्म-योग), ये दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं परन्तु सांख्य-योग की अपेक्षा निष्काम कर्म-योग श्रेष्ठ है। आइए ! इसको थोड़ा समझ लें—“संन्यास” का दूसरा अर्थ “सांख्ययोग” भी है। सांख्ययोग में ज्ञान की प्रधानता होती है, इसीलिए इसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है। सांख्ययोग से कर्मयोग श्रेष्ठ है और कर्मयोग से भक्तियोग श्रेष्ठ है।

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌।

पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌॥

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥

“सांख्ययोगी” की विशेषता बताते हुए भगवान कहते हैं कि सांख्ययोगी परमतत्व का चिंतन करते हुए इस जगत में देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ, श्वांस लेता हुआ भी यही सोचता है कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।

वह बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और बन्द करता हुआ भी, यही सोचता है कि सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त हो रही हैं, मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। “सांख्ययोगी” व्यक्ति अपने शरीर और इंद्रियों के साथ कभी भी अपना संबंध नहीं मानता। जैसे शरीर बालक से वृद्ध हो जाता है, बाल काले से सफेद हो जाते हैं, खाया हुआ अनाज पच जाता है, शरीर का सबल अथवा निर्बल होना आदि क्रियाएँ अपने आप होती हैं, वैसे ही दूसरी क्रियाओं को भी सांख्ययोगी अपने आप होने वाली क्रियाएँ ही मानता हैं। वह स्वयं को कर्ता कभी नहीं मानता। गीता में स्वयं को कर्ता मानने वाले की निंदा की गई है।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! सिद्ध महापुरुष वह है जो विद्या और विनम्रता से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चांडाल को भी एक समान दृष्टि से देखता है। ब्राह्मण और चांडाल तथा गाय, हाथी और कुत्ते में व्यावहारिक भेद हो सकता है और होना भी चाहिए। जैसे कि- मान-सम्मान तथा पूजन विद्या और विनम्रता से युक्त ब्राह्मण का ही हो सकता है न कि चांडाल का, दूध गाय का ही पिया जाता है न कि कुतिया का, सवारी हाथी की ही हो सकती है न कि कुत्ते की। इन पांचों प्राणियों का उदाहरण देकर भगवान यह समझाना चाहते हैं कि इनमें व्यावहारिक समानता संभव न होने पर भी इन सब में एक ही परमात्मा का तत्व है।

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध इन विषयों से इन्द्रियों का संबंध होने पर जो सुख मिलता है उसे भोग कहते हैं। साधारण व्यक्ति को जिन भोगों में सुख मिलता है, उन भोगों को बुद्धिमान व्यक्ति दुखरूप ही समझता है। इसलिए वह उन भोगों में रमण नहीं करता। वह इंद्रियों के अधीन नहीं होता बल्कि इंद्रियाँ उसके अधीन होती हैं।

अब आगे के श्लोक में भगवान बताना चाहते हैं कि- जिस तत्व को ज्ञानयोगी और कर्मयोगी प्राप्त करते हैं, उसी तत्व को ध्यानयोगी भी प्राप्त कर सकता है।

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।

प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।

विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥

परमात्मा के सिवाय सभी बाहरी वस्तुओं का चिन्तन छोड़कर और आँखों की दृष्टि को भौहों के बीच में केन्द्रित करके प्राण-वायु और अपान-वायु की गति समान करके मन, इन्द्रियों और बुद्धि को वश में करके ध्यान पूर्वक मोक्ष के लिये तत्पर ध्यान योगी सदैव मुक्त हो जाता है। कर्मयोग, सांख्ययोग, ध्यानयोग और भक्तियोग में साधक को दृढ़ निश्चय होना अति आवश्यक है।

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

भगवान सभी यज्ञों और तपस्याओं को भोगने वाले हैं। सम्पूर्ण लोकों के परमेश्वर हैं तथा हमारे परम हितैषी और सखा हैं। इन तीनों बातों में से अगर हम एक बात भी दृढ़तापूर्वक मान लें, तो भगवत प्राप्ति (परम-शान्ति) निश्चित है, फिर ये तीनों ही बातें मान लें, तो क्या कहना है।

हमें सदा याद रखना चाहिए कि हमारे आध्यात्मिक जीवन में भगवान श्री कृष्ण से बढ़कर कोई हितैषी नहीं, हरे कृष्ण से बड़ा कोई मंत्र नहीं और एकादशी व्रत से श्रेष्ठ कोई दूसरा व्रत नहीं है। किन्तु ये सब केवल भगवान की प्रीति के लिए ही करना चाहिए।

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु…

जय श्री कृष्ण…

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