बिना नक्शा के बने भवनों को रेगुलराइज किया जाए ताे लाेगाें काे राहत

रांची : श्याम सुंदर केडिया के पिताजी ने 80 साल पहले अपर बाजार में जमीन खरीदी थी। वे चार भाई थे, इसलिए सभी भाइयों में जमीन बंट गया। समय के साथ केडिया के भाइयों के बीच भी जमीन का बंटवारा हो गया। करीब 25 फीट जमीन इनके हिस्से मिली। अब उनके बेटों के बीच वह जमीन बंट गयी। ऐसे में एक बेटे को दो रूम बनाने भर जमीन मिली। उनके बेटेे रोजगार के लिए नीचे दुकान, उपर मकान बना रहने लगे। केडिया ने बताया कि चार भाई के 14 बच्चे हो गए,तो सब साथ कैसे रह सकते हैं। परिवार बढ़ा, घर की जरूरतें बढ़ी तो अलग-अलग घर सभी ने बनाया। निगम को कॉमर्शियल घर का टैक्स भी देते हैं। अब 70 साल पुराने भवन को भी अवैध बोला जाएगा, तो क्या तक सकते हैं।

70 साल पहले चार कट्टा जमीन ली थी, उसी पर नीचे दुकान ऊपर घर बनाया

अपर बाजार में वीणा वस्त्रालय के संचालक रतन मोदी के दादाजी ने 70 साल पहले अपर बाजार में चार कट्टा जमीन ली थी। पहले ऊपर घर, नीचे दुकान थी। परिवार बढ़ता गया, तो अब छह भाइयाें में जमीन बंट गयी। सभी को रोजगार करना था। ऐसे में अधिकतर क्षेत्र को व्यवसायिक भवन में तब्दील कर दिया। पहले से बने भवन के उपर ही कुछ निर्माण किया गया, क्योंकि एक ही व्यवसाय से पूरा परिवार जुड़ा था। इसके बदले वे कॉमर्शियल टैक्स भी देते हैं। मोदी ने बताया कि अपर बाजार क्षेत्र आज भी आवासीय ही है। कुछ लोगों ने बिल्डिंग बनाकर दुकानें बेच दी। बेसमेंट की पार्किंग में दुकाने बना दीं, जिससे जाम की समस्या हो रही है।

150 साल पहले अपर बाजार में आकर बसे, मां ने ही बचाए पैसों से 63 कड़ी जमीन खरीदी

विश्वनाथ नारसरिया के परदादा 150 वर्ष पहले राजस्थान से आकर रांची में बसे थे। 1950 में उनकी मां अपने बचाए पैसे से 63 कड़ी जमीन अपर बाजार में खरीदी। नारसरिया और उनके भाई ने नीचे दो दुकान बनाया और उपर पूरा परिवार आज भी रहता है। दुकान 1965 से वैसे ही चल रही है। इसके बावजूद इस पर अवैध निर्माण का केस दर्ज किया गया। नारसरिया ने बताया कि उनके भाई के दो लड़के हैं। अब यही जमीन उनके बीच रहेगी। परिवार बढ़ने के साथ घर की जरूरतें बढ़ीं, तो उपर निर्माण कराया। ग्राउंड फ्लोर का नक्शा भी पास है, फिर भी निगम ने केस दर्ज किया। सरकार भवनों को सरल तरीके से रेगुलराइज करे, तो वे सबसे पहले अपना घर रेगुलराइज कराएंगे।

ऑर्किटेक्ट सुजीत भगत ने बताया कि लोगों को बिना नक्शा के बने भवनों को रेगुलराइज करने का मौका दो बार मिला, लेकिन पहली बार 2012 में बने नियम इतने पेंचिदा थे कि कुछ ही भवन नियमित हो पाए। डर से दूसरी बार 2019 में कम लोगों ने आवेदन दिया। शुल्क भी अधिक था। रेगुलराइज करना है, तो आवासीय भवन के मामले में जैसा बना है,उसे वैसा ही नियमित करना होगा।

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