चंदा को क्यों कहा जाता है मामा ? महीने में बस एक ही दिन क्यों पूर्ण नजर आते हैं चंद्रमा ?

सूरदास के पदों से लेकर कहानी की हर किताब में हम चंदा को प्यारे-प्यारे मामा ही कहते आए हैं। बरसों से हर मां अपने बच्चे को चंदा मामा की लोरी सुनाती आ रही है लेकिन क्या कभी आपने सोचने की कोशिश की आखिर चंदा को मामा ही क्‍यों कहते हैं, चाचा, ताऊ, फूफा… क्‍यों नहीं?

जानिए चंद्रमा के बारे में 10 रोचक बातें..

तो चलिए आज हम आपको इसका राज बताते हैं। दरअसल पौराणिक कथाओं के अनुसार जिस समय देवताओं और असुरों के बीच में समुद्र मंथन हो रहा था, उस समय समुद्र से बहुत सारे तत्व निकलेंं थे जिसमें मां लक्ष्मी, वारुणी,चन्द्रमा और विष भी थे।

मां लक्ष्मी के छोटे भाई हैं चंद्रमा

लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के पास चली गईं, इसलिए उनके बाद जो भी तत्व निकलें वो उनके छोटे भाई और बहन बन गए। चंद्रमा उनके बाद समुद्र से निकले थे इसलिए वो उनके छोटे भाई बन गए और चूंकि लक्ष्मी को हम अपनी माता मानते हैं ना इसलिए उनके छोटे भाई हमारे मामा बन गये। इसी कारण चंदा को मामा कहा जाता है। चूंकि ये सभी समुद्र के मंथन से निकले थे, इस कारण समुद्र ही इन सबके पिता कहलाते हैं।

चंद्रमा का महत्व

मानव का जीवन चक्र मुख्य रूप से चंद्र द्वारा ही संचालित होता है। चंद्र के रेखांशों के आधार पर ही जातक का जन्म नक्षत्र और उसके जीवन में दशा मुक्ति की अवधियों और क्रम को तय किया जाता है। इन्हीं दशा मुक्तियों के आधार पर ही जातक के जीवन में घटने वाली अच्छी−बुरी घटनाओं और उनकी समयावधियों को आसानी से जाना जा सकता है। भारत में एक परम्परा यह भी रही है कि चंद्र जिस राशि में जन्म के समय रहता है, उसी राशि के लिए नियत अक्षरों से ही जातक का नाम रखा जाता है।

राशियों से संबंध

चंद्र चूकि जलीय ग्रह है इसलिए यह जल की ही तरह अच्छा और बुरा दोनों प्रकार के परिणाम देने में सक्षम है। चंद्र कर्क राशि का स्वामी है जोकि गतिशील और जलीय राशि होती है। जो जातक कर्क लग्न या कर्क राशि में जन्म लेते हैं वह चंद्र की प्रकृति, स्वभाव और गुणावगुणों से ओत−प्रोत होते हैं। इन जातकों के विचार स्थिर नहीं होते और इसी प्रकार उनके भाग्य में भी परिवर्तन होते रहते हैं। उनका भाग्य चंद्रमा की ही तरह घटता−बढ़ता रहता है। चंद्र की उच्च राशि वृष और नीच राशि वृश्चिक है। चंद्र हमारे व्यवहार, हमारी दिनचर्या और प्रकृति का नियंत्रक तथा संचालक होता है।

इसलिए कहा जाता है चंदा को मामा

चंदा को मामा कहनेे की कहानी के पीछे दूसरा कारण ये भी बताया जाता है कि चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है और दिन-रात उसके साथ एक भाई की तरह रहता है, अब चूंकि धरती को हम ‘मां’ कहते हैं इसलिए उनके भाई हमाारे मामा हुए इसलिए चंदा को मामा कहा जाता है।

चंद्र बच्चों में जीवन की अवधि तथा महिलाओं में मासिक स्राव चक्र आदि का भी नियंत्रक होता है। विवाह तथा महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत, त्योहार एवं पर्व तथा लंबी यात्राएं व धार्मिक अनुष्ठानों आदि का निर्धारण चंद्र के शुभ नक्षत्रों में रहने की अवधि के आधार पर ही किया जाता है। चंद्र सभी के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि माता अपने बच्चे से। चंद्रमा को मानव मन और मातृत्व भावना से ओतप्रोत कहा जाता है। चंद्रमा किसी के प्रति भी शत्रुता का भाव नहीं रखता। इसलिए कहा जाता है चंदा को मामा। जिन जातकों की जन्मकुंडलियों में चंद्र शुभ तथा दुष्प्रभावों से मुक्त होकर बैठता है, वह दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेना पसंद करता है। ऐसे जातक सरल तथा विनम्र स्वभाव के होते हैं और अपनी अंतरात्मा की आवाज ज्यादा सुनते हैं।

सौरमंडल में चंद्र ग्रह का अन्य ग्रहों की अपेक्षा आकार छोटा है। यह ग्रह पृथ्वी के सबसे निकट भी है। चंद्रमा पृथ्वी के साथ ही सूर्य की भी परिक्रमा करता रहता है। चंद्रमा का कितना महत्व है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारतीय ज्योतिष विज्ञान को चंद्र आधारित बनाया गया है यही नहीं ज्योतिष विज्ञान में जातक के जन्म के समय चंद्र जिस राशि में संचरण कर रहा हो, उसी को जातक का लग्न माना जाता है।

चंद्र भावनाओं और इच्छाओं का नियंत्रक व संचालक भी है। जिस जातक की जन्मकुंडली में चंद्र जिस भाव तथा जिस राशि में होता है उसी के आधार पर वह जातक की मनोवृत्ति और भावनाओं को ढालता है। मान लीजिए यदि चंद्र किसी जातक की कुंडली में लग्न में स्थित हो तो वह अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहता है। दूसरे भाव में चंद्र हो तो जातक अपने परिवार और संबंधियों से गहरा लगाव रखता है।

चंद्र देवता का परिचय

चंद्र महर्षि अत्रि और महासती अनुसूया के पुत्र हैं। हालांकि इस बात को लेकर विभिन्न पुराणों में अलग−अलग बातों का उल्लेख है। पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र महर्षि अत्रि ने एक बार घोर तप किया। तप के समापन के बाद उनकी आंखों से कुछ आंसू निकले जिन्हें पवन ने उड़ाकर विभिन्न दिशाओं में फैला दिया। दिशाकन्याओं ने इन आंसुओं को संतान प्राप्ति के उद्देश्य से ग्रहण कर लिया लेकिन वे इन महातेजस्वी आंसुओं की बूंदों को गर्भ में संभाल नहीं सकीं और उनका त्याग कर दिया।

भगवान ब्रह्माजी ने उन त्यागे हुए आंसुओं को एक बहुत ही सुंदर युवा पुरुष के रूप में बदल दिया और उसे ब्रह्मलोक ले गए। ब्रह्माजी ने उनका नाम चंद्रमा रखा। वहां देव, गंधर्व, ऋषियों तथा अप्सराओं ने जो स्तुतियां कीं उससे चंद्रमा का तेज और बढ़ गया। दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 नक्षत्र कन्याओं का विवाह चंद्रमा के साथ कर दिया। इन सभी कन्याओं में रोहिणी चंद्रमा को अत्यधिक प्रिय थी इसलिए अन्य पत्नियों की वह उपेक्षा कर दिया करते थे। इस बात से परेशान दक्ष ने चंद्रमा को नपुंसकत्व का श्राप दे दिया। बाद में भगवान शिव की आराधना कर चंद्रमा ने इस श्राप का प्रभाव तो कम करवा लिया लेकिन इससे पूरी तरह मुक्ति नहीं पा सके। वह महीने में बस एक ही दिन पूर्ण पुरुष के रूप में आ पाते हैं शेष दिन वह अधूरे ही रहते हैं।

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