किस देवता के आशीर्वाद के चलते हनुमानजी सदैव जल से सुरक्षित रहते हैं ?

इंद्र अपने प्रिय हाथी ऐरावत पर बैठकर चलने लगे तो हनुमानजी ऐरावत पर भी झपटे। इस पर इंद्र को क्रोध आ गया। उन्होंने बालक पर वज्र से प्रहार किया तो हनुमानजी की ठुड्डी घायल हो गई। वह बेहोश होकर पर्वत शिखर पर गिर गए।

एक बार की बात है माता अंजनी अपने बेटे को पालने में लिटा कर फल−फूल लेने के लिए वन में चली गईं। तभी बालक हनुमान ने पूर्व दिशा में सूर्य को उदय होते देखा। बस क्या था! हनुमानजी तुरंत आकाश में उड़ चले। वायुदेव ने जब यह देखा तो वह शीतल पवन के रूप में उनके साथ चलने लगे ताकि बालक पर सूर्य का ताप नहीं पड़े। अमावस्या का दिन था। राहु सूर्य को ग्रसित करने के लिए बढ़ रहा था तो हनुमानजी ने उसे पकड़ लिया। राहु किसी तरह उनकी पकड़ से छूट कर भागा और देवराज इंद्र के पास पहुंचा।

इंद्र अपने प्रिय हाथी ऐरावत पर बैठकर चलने लगे तो हनुमानजी ऐरावत पर भी झपटे। इस पर इंद्र को क्रोध आ गया। उन्होंने बालक पर वज्र से प्रहार किया तो हनुमानजी की ठुड्डी घायल हो गई। वह बेहोश होकर पर्वत शिखर पर गिर गए। यह सब देखकर वायुदेव को भी क्रोध आ गया। उन्होंने अपनी गति रोक दी और अपने पुत्र को लेकर एक गुफा में चले गए। अब वायु के नहीं चलने से सब लोग घबरा गए। देवतागण सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी के पास पहुंचे। सारी बात सुनकर ब्रह्माजी उस गुफा में पहुंचे और हनुमानजी को आशीर्वाद दिया तो उन्होंने आंखें खोल दीं। पवन देवता का भी क्रोध शांत हो गया। ब्रह्माजी ने कहा कि इस बालक को कभी भी ब्रह्म श्राप नहीं लगेगा। इसके बाद उन्होंने सभी देवताओं से कहा कि आप सब भी इस बालक को वर दें। इस पर देवराज इंद्र बोले कि मेरे वज्र से इस बालक की हनु यानि ठोढ़ी पर चोट लगी है इसलिए इसका नाम हनुमान होगा। सूर्य ने बालक हुनमान को अपना तेज दिया तो वरूण ने कहा कि हनुमान सदा जल से सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार हर देवता ने हनुमानजी को वर प्रदान किया जिससे वह बलशाली हो गए।

हनुमानजी बहुत ही चंचल थे। वह जब चाहे जहां चाहें पहुंच जाते थे और जो मन में आता वह कर डालते थे। हनुमानजी की शरारतों से आश्रमों में रहने वाले ऋषि−मुनि परेशान रहते थे। इस पर ऋषि−मुनियों ने हनुमानजी को श्राप दिया कि जिस बल के कारण तुम इतने शरारती हो गए हो उसी को लंबे समय तक भूले रहोगे जब कोई तुम्हें तुम्हारे बल के बारे में याद दिलाएगा तभी तुमको सब याद आएगा। इस श्राप के कारण हनुमानजी का स्वभाव शांत और सौम्य हो गया।

इसके बाद उनके माता−पिता ने उन्हें शिक्षा−दीक्षा के लिए सूर्यदेव के पास भेजने का निर्णय किया तो हनुमानजी बोले कि सूर्यदेव तो बहुत दूर हैं, मैं वहां पहुंचुंगा कैसे? उनकी माता अंजनी हनुमानजी को मिले श्राप के बारे में जानती थीं और जब उन्होंने उनको उनके बल के बारे में याद दिलाया तो उन्हें सब याद आ गया कि बचपन में वह किस प्रकार सूर्य की ओर लपके थे। वह आकाश में जा पहुंचे और सूर्यदेव के सारथि अरुण से मिले जोकि उन्हें सूर्यदेव के पास ले गए। सूर्यदेव ने उनके आने का कारण जाना तो बोले कि मैं तो हर समय अंतरिक्ष की यात्रा करता रहता हूं मुझे एक पल का भी आराम नहीं है मैं तुम्हें किस प्रकार शिक्षा−दीक्षा दे पाऊंगा। इस पर हनुमानजी बोले कि मैं आपके रथ के वेग के साथ−साथ चलता रहूंगा क्योंकि मुझे आपसे ही शिक्षा प्राप्त करनी है। इस पर सूर्यदेव ने हां कर दी और पूरे मनोयोग से हनुमानजी को हर शास्त्र में निपुण बना दिया। शिक्षा खत्म होने के बाद जब हनुमानजी चलने लगे तो उन्होंने दक्षिणा के बारे में पूछा तो सूर्यदेव बोले कि मुझे कुछ नहीं चाहिए लेकिन यदि कपिराज बाली के छोटे भाई सुग्रीव की मदद का वचन मुझे दोगे तो मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी। इस पर हनुमानजी ने उन्हें सुग्रीव की मदद करने का वचन दिया।

बाद में हनुमानजी ने सुग्रीव की भरपूर मदद की और उनके खास मित्र बन गए। सीताजी का हरण करके रावण जब उन्हें लंका ले गया तो सीताजी को खोजते श्रीराम और लक्ष्मणजी से हनुमानजी की भेंट हुई। उनका परिचय जानने के बाद वह उन दोनों को कंधे पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले गए। सुग्रीव के बारे में जानकर श्रीराम ने उन्हें मदद का भरोसा दिया और सुग्रीव ने भी सीताजी को ढूंढ़ने में मदद करने का वादा किया। श्रीरामजी ने अपने वादे के अनुसार, एक ही तीर में बाली का अंत कर दिया और सुग्रीव फिर से किष्किन्धा नगरी में लौट आए। उसके बाद सुग्रीव का आदेश पाकर प्रमुख वानर दल सीताजी की खोज में सब दिशाओं में चल दिए। श्रीरामजी ने हनुमानजी से कहा कि मैं आपकी वीरता से परिचित हूं और मुझे विश्वास है कि आप अपने लक्ष्य में कामयाब होंगे। इसके बाद श्रीराम जी ने हनुमानजी को अपनी एक अंगूठी दी जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था।

सीताजी का पता मिलने के बाद जब हनुमानजी लंका में पहुंचे तो उन्होंने माता सीता से भेंटकर उन्हें श्रीराम का संदेश दिया और लंका की पूरी वाटिका उजाड़ने के बाद लंका में आग भी लगा दी। इसके बाद सीताजी को मुक्त कराने के लिए जो युद्ध हुआ उसमें हनुमानजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीताजी को मुक्त कराकर जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो अपनी तीनों माताओं का आशीर्वाद लिया और सभी वानरों को बहुमूल्य उपहार दिए। सीताजी बैठी देख रही थीं कि श्रीराम ने सबको कुछ न कुछ दिया लेकिन हनुमानजी की ओर उनका ध्यान नहीं गया।

इस पर उन्होंने अपना हार हाथ में लेकर श्रीरामजी की ओर देखा तो श्रीराम बोले कि हां, हनुमानजी को तो मैं भूल ही गया तुम ही इन्हें कुछ दो। इस पर सीताजी ने अपना हार हनुमानजी को दे दिया तो हनुमानजी ने पहले तो हार गले में डाल लिया और फिर बाद में उसे गले से उतार कर उसके एक−एक मोती को छूकर देखने लगे और फिर हर मोती को मुंह में डालकर तोड़ते और देखते गए। इस पर वहां उपस्थित विभीषण बोले कि हनुमानजी यह क्या कर रहे हो? तो हनुमानजी बोले कि मैं यह देख रहा था कि इसके अंदर मेरे प्रभु की छवि है या नहीं। इस पर विभीषण बोले कि तो क्या आपके अंदर प्रभु की छवि है? हनुमानजी ने कहा कि निश्चित रूप से। और यह कहकर उन्होंने अपने दोनों हाथों के नाखूनों से अपना सीना चीर कर दिखा दिया। सबने देखा कि किस प्रकार हनुमानजी के हृदय में श्रीराम और सीताजी बसे हुए हैं। यह देख श्रीराम और सीताजी के होठों पर मनमोहिनी मुस्कान थी। इस पर श्रीराम जी के दरबार में श्रीराम जी की जय के साथ ही भक्त हनुमान जी की भी जयकार गूंज उठी।

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